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अब सिर्फ चुनाव जीतने के लिए हो रही है राजनीति

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अब सिर्फ चुनाव जीतने के लिए हो रही है राजनीति
अब सिर्फ चुनाव जीतने के लिए हो रही है राजनीति
 लोकतांत्रिक राजनीति का अगर परिदृश्य देखा जाए तो यहां यह साफ हो जाता है कि जनता के मूड पर सब निर्भर करता है। यहां जनता की मूड ही निर्णय  करती है कि राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा । ऐसे में सभी पार्टियों तथा नेताओं के पास अपना विजन होता है। जिसे लेकर सभी जनता के समझ जाते हैं तथा हाथ पांव पकड़कर जनता के मूड को अपने फेवर में करने का प्रयास करते हैं।
अब सिर्फ चुनाव जीतने के लिए हो रही है राजनीति
अतः  कहीं ना कहीं जनतंत्र राज्य को चलाने के लिए अन्य सभी तंत्रों से बेहतर तो है ही। यहां ना किसी तानाशाही का डर  है और ना ही किसी के गुलामी की चिंता। जैसे राजतंत्र में हुआ करती है। परंतु फिलहाल लोकतंत्र में भी राजनीति ने बहुत रंग बदले है। चुनाव लड़ने का तरीका बदला है और चुनाव लड़ने के लिए टिकडमबाजी में भी वृद्धि हुई है। एक समय था जब नेता अपनी लोकप्रियता तथा अपने प्रतिभा के बल पर चुनाव जीतता था। तब उसे सच्चे मायनों में राजनेता कहा जाता था।
परंतु फिलहाल देखा जाए तो  जननेता बड़ी मुश्किल से कुछ एक मिलते हैं अन्यथा अधिकतर गन नेता ही नजर आते हैं। जो नेता कम गुंडे अधिक होते हैं । जिनकी कद की ऊंचाई हत्या बलात्कार व भ्रष्टाचार की नींव पर बुलंद होती है । जिसके पीछे जितने अधिक शोहदों  की भीड़ होती है और जितने अधिक बंदूकें होती है, वह उतना ही बड़ा नेता है आजकल।
अब सिर्फ चुनाव जीतने के लिए हो रही है राजनीति
 उसमें भी बड़े नेताओं की तो बात ही छोड़िए। यह लोग चुनाव जीतने व कुर्सी पाने के लिए किसी हद तक जा सकते हैं। यह लोग कभी जाति-जाति खेलते हैं तो कभी धर्म धर्म। पर कभी विकास का नाम अपने मुंह से नहीं लेते । इनकी नजर बस सत्ता पर पहुंचने की होती है। अब चाहे जाति की टिकड़अंबाजी करके  सत्ता  तक पहुंचा जाए या धर्म की अथवा दंगे ही करवा कर क्यों न हो जाए, पर सत्ता तक पहुंचना ही है किसी भी हाल में। हमारे इन नेताओं को चाहे जनता पानी बिना मरे या खाना-पीना मरे चाहे युवा बेरोजगार ही क्यों ना रहे चाहे किसान आत्महत्या ही क्यों न करें और चाहे भ्रष्टाचार की सुरसा  देश को निकल ही क्यों ना जाए इन सब से कोई मतलब नहीं होता। हमारे नेताओं को इनके बस वोट से मतलब होता है। वोट के लिए यह लोग टोपी भी लगा सकते हैं और टीका भी लगा सकते हैं। वोट के लिए यह मस्जिद भी जाएंगे और मंदिर भी जाएंगे। चाहे मन में  जितने भी काले विचार क्यों ना हो?  पर यह दिखावा अवश्य ही करेंगे। चुनाव के बाद कोई टोपी नहीं लगाता व कोई टीका को नहीं पूछता, कोई मंदिर मस्जिद नहीं जाता और ना ही कोई जाति जाति करता है और ना ही कोई धर्म धर्म। पर चुनाव आते ही सब को यह सब याद आने लगते हैं।
अब सिर्फ चुनाव जीतने के लिए हो रही है राजनीति
अब सिर्फ चुनाव जीतने के लिए हो रही है राजनीति
  पार्टियों ने तो हद ही कर दी है। सत्ता के लिए इतना नीचे गिरने में दूसरा कोई सानी नहीं इनका। चुनाव के समय विचारधारा ताक पर होता है और जीत ही सब कुछ होता है। विचार धारा जाए तेल लेने। इन्हें तो कुर्सी हथियाना है किसी भी तरह करके।
आरोप प्रत्यारोप तथ्यों पर नहीं होते बल्कि कुतर्कों पर आधारित होते हैं। जब दो पार्टियों के प्रवक्ता एक दूसरे से TV पर डिबेट करते हैं तो लगता है 2 वहशी आदमी एक दूसरे से बात कर रहे हैं। चर्चा से विकास गायब होता है। बस जाति जाति और धर्म धर्म की बात होती है। व्यक्तिगत अटैक होते हैं, तू तू मैं मैं होती है। यह सब देख कर तो यही लगता है कि राजनीति का स्तर वर्तमान में बहुत ही नीचे जा चुका है।
अब चुनाव विचारधाराओं के बीच नहीं हो रहा है बल्कि चुनाव का मकसद नेताओं तथा पार्टियों के लिए जीत तक सीमित हो गया है।  चाहे कोई भी गलत हथकंडा क्यों ना अपनाना पड़े परंतु नेता तनिक भी संकोच नहीं करता। उसे हर हाल में जीतना होता है चाहे कुछ भी करके।

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