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क्या अब केवल चुनाव जीतने के लिए किया जाता है राजनीति

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अब केवल चुनाव जीतने के लिए किया जाता है राजनीति

 

 

 

क्या अब केवल चुनाव जीतने के लिए किया जाता है राजनीति —————-
 राजनीति को या तो लोकतंत्र का  त्योहार कहा जा सकता है या फिर उस प्रतिस्पर्धा के रूप में भी देखा जा सकता है जहां पर नेता तथा   राजनीतिक पार्टीयां  सत्ता के लिए जंग करती है। परंतु यहां पर नेता अथवा पार्टी के हाथ में कुछ नहीं होता। अगर कुछ होता है तो वह केवल जनता के हाथ में। जनता के ऊपर यह निर्भर करता है कि कौन बुलंदी को स्पर्श करेगा और कौन जमीन पर धड़ाम से गिरेगा। यानी  राजनीति  का ऊट किस करवट बैठेगा यह बात सिर्फ व सिर्फ जनता के ऊपर निर्भर करता है। हां पार्टी का अपना-अपना उद्देश्य होता हैै तथा उनका अपना विजन होता है जिसे लेकर  वह जनता के सामने   जाते हैं तथा अपनी बात रखते हैं और जनता के सामने वोट पाने के लिए पांव भी पढ़ते हैं। अत:   वास्तविक रुप से जन तंत्र को देखा जाए तो यहां पर राजा जनता के अधीन होता है। इसलिए मेरा मानना  तो यही है कि राज्य को चलाने के लिए जन तंत्र से बेहतर कोई और तंत्र हे ही नहीं है ।इसमे गुलामी की चिंता नहीं होती, प्रत्येक इंसान बराबर होता है तथा स्वतंत्र रूप से जीवन नर्वाह कर सकता है।
क्या अब केवल चुनाव जीतने के लिए किया जाता है राजनीति
 खैर लोकतंत्र खूबसूरत तंत्र तो है ही इसे लेकर कोई दो राय नहीं है। परंतु वर्तमान अवस्था में देखा जाए तो इस तंत्र में भी राजनीति ने गिरगिट की तरह रंग बदल ली है। चुनाव लड़ने  में राजनेताओं तथा पार्टियों के द्वारा तिकड़म बाजी में बढ़ोतरी हुई है और चुनाव लड़ने का तरीका भी पूरा का पूरा बदल  चुका है।पहले राजनेता जनता का प्रतिनिधि होता था। उसमें राजनीतिक प्रतिभा होती थी तथा वह लोकप्रिय भी होता था। अब नेता गुंडा होता है। किसी जाति धर्म अथवा वर्ग का प्रतिनिधि होता है और भ्रष्टाचारी होता है। हालांकि मैं सभी नेताओं को ऐसा नहीं कर रहा पर अधिकतर नेता इसी श्रेणी में आते हैं। फिलहाल में तो ज्यादातर नेताओं में यही देख रहा हूं । बहुतों पर तो हत्या और बलात्कार का भी आरोप हैं।  इस परिपेक्ष में यदि देखा जाए तो जनता भी कुछ कम दोषी नहीं है। क्योंकि वह ऐसे ही लोगों को चुनती है जो उनके जाति धर्म अथवा वर्ग से जुड़े होते हैं । भले ही नेताजी हत्या बलात्कार व भ्रष्टाचार में क्यों न लिप्त हो। अतः यहां पर जनता को भी  ध्यान देने की जरूरत है इस विषय पर।
क्या अब केवल चुनाव जीतने के लिए किया जाता है राजनीति
 फिलहाल राजनीति में बहुत बुराइयां भी शामिल हुई है और अच्छाइयां भी। हमारे देश की राजनीति में अच्छाइयों का शामिल होना बहुत ही अच्छी बात है पर  बुराइयों का शामिल होना दुखद है। क्योंकि इससे राजनीति का स्तर गिरता है और कहीं ना कहीं यह देश के लिए भी खतरा है। अतः हमें राजनीति में हुई अच्छाइयों का नगाड़ा नहीं पीटना चाहिए, बल्कि बुराइयों को लेकर चिंतित अवश्य होना चाहिए। आज जब राजनीति होती है तो उसमें देशहित नहीं शामिल होता बल्कि मात्र चुनावी जीत को ही मुख्य उद्देश्य बनाया जाता है। इसके लिए नेता टीका, टोपी, मंदिर-मस्जिद, जाति धर्म, वर्ग , संगठन, मतभेद, दंगा कुछ नहीं छोड़ते। जीतने के लिए सारे हथकंडे अपनाते हैं। चाहे स्तर को कितना भी नीचे क्यों न ले जाना पड़े। चुनाव आते ही विचारधारा का कोई मोल नहीं रह जाता, अगर कुछ होता है तो चुनावी विजय। TV पर बैठकर प्रवक्ता आरोप प्रत्यारोप तथ्यों पर नहीं करते बल्कि कुतर्कों पर निर्भर रहते हैं। एक दूसरे  से तू तू मैं मैं तथा कभी-कभी तो गाली गलौज भी करने पर उतरू हो जाते हैं।
अब केवल चुनाव जीतने के लिए किया जाता है राजनीति
कुल मिलाकर कहा जाए तो आजकल चुनाव हथकंडों पर आधारित हो गया है। जिसका इस्तेमाल चुनाव में नेताओं द्वारा बड़ी ही चतुराई से किया जाता है । कई बार अच्छे लोग चुनाव हार जाते हैं तथा बुरे लोग जीत जाते हैं। ऐसा इन्ही   हथकंडों तथा तिकड़मबाजी की वजह से होता है। ऐसे में अब तो यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या अब राजनीति केवल चुनाव जीतने के लिए किया जाता है। मुझे तो ऐसा ही लगता है आप क्या सोचते हैं कमेंट करके बताएं।

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