Home news and politics बड़ा ही अजीब हो गया है लेखकों और राजनीति का संबंध 

बड़ा ही अजीब हो गया है लेखकों और राजनीति का संबंध 

2
SHARE

बड़ा ही अजीब हो गया है लेखकों और राजनीति का संबंध
राजनीति एक ऐसा विषय है जिस पर जितना कहा सुना जाए उतना ही कम होता है। ऐसे में बड़ा ही अजीब हो गया है लेखकों और राजनीति का संबंध।  अंततः इस पर हर समय कुछ ना कुछ कहने सुनने के लिए बाकी रह ही जाता है। राजनीति का क्षेत्र बृहद है तथा पूरे संसार में फैला है। यहां तक कि राज्य का हर तंत्र कहीं ना कहीं राजनीति की एक कड़ी है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता की राजनीति समस्त दुनिया का एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है।
 दरअसल जब तक इस संसार में राज्य किसी न किसी रूप में विराजमान रहेगा तथा सत्ता की विरासत चलती रहेगी तब तक किसी न किसी रूप में संसार में राजनीति का होना भी स्वभाविक है। यदि आप सियासत पर विचार रख सकते हैं तो अवश्य रखिए मेरी माने तो आपको सुनने वाला समझने वाला मुरीद कोई ना कोई अवश्य ही मिल जाएगा। परंतु यह भी ध्यान दीजिएगा कि आपके आलोचकों की भी कमी कुछ कम नहीं रहेगी। राजनीति में मकसद बदलते ही दोस्त और दुश्मन भी बदल लिए जाते हैं। यह बात बहुत बार परख लिया गया है।
बड़ा ही अजीब हो गया है लेखकों और राजनीति का संबंध
 इंटरनेट की दुनिया में आप देख लीजिए। ब्लॉग और वेबसाइट पर नए नए लेख प्रकाशित होते ही रहते हैं। टेलीविजन पर तू-तू-मैं-मैं होता ही रहता है। राजनीति पर प्रकाशित लेख को पढ़ने वाले सहज ही मिल जाते हैं । हमारे इस बिगड़ैल समाज में साहित्यिक लेखों को तो कोई पूछता भी नहीं है। जैसे साहित्य गली कूचे में फिरता लावारिस बच्चा है। परंतु वही राजनीतिक लेखों पर गौर किया जाए तो यह पहले के दौर में भी प्रासंगिक था और आज भी प्रासंगिक है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि राजनीति से हटकर लिखा भी क्या जाए और क्यों जाए? क्योंकि आप सही मायने में लेखक तभी है जब आपका लेख कहीं ना कहीं सियासत से प्रभावित होता है ।
 अगर आप लिखने में माहिर हैं और आपको लेखक बनने का शौक है तो कोई बात नहीं जमकर लिखिए और खूब लिखिए पर इतना ख्याल जरूर रहे कि आपके लेख का संबंध कहीं ना कहीं राजनीति से अवश्य ही होना चाहिए।क्योंकि बड़ा ही अजीब हो गया है लेखकों और राजनीति का संबंध तो चोली-दामन जैसा होता  है।  आप मेरी यह बात पल्ले बांध लीजिए कि अगर आप इस काम में सफल रहते हैं तो आप अवश्य ही 21वीं सदी के बेहतरीन लेखकों में से एक हैं अन्यथा आप भूल जाइए कि लेखक हैं। और आप भी दो कौड़ी के और आपकी लेखनी भी दो कौड़ी की।
अजीब हो गया है लेखकों और राजनीति का संबंध 
हर जगह देखने में आ रहा है कि राजनीतिक विषयों पर लिखने पढ़ने वालों का भाव कुछ अधिक ही बढ़ गया है। जो लोग किसी राजनीतिक पार्टी के पक्ष में लिखते हैं उन्हें पुरस्कार मिलता है, नौकरी मिलती है,  अगर बोलने बतियाने और शब्दों को तोड़ने मरोड़ने की कला है तो पार्टी का प्रवक्ता भी बना दिया जाता है। मतलब आप दामाद की तरह पूजे  जाते हैं। परंतु जो लोग किसी पार्टी की आलोचना कर देते हैं उनको तो पार्टी अपने पुश्तैनी दुश्मन से भी बड़ा दुश्मन मान लेती है। ऐसे में जो लोग तटस्थ होकर लिखते हैं जिनको न्यूट्रल लेखक कहा जाता है उनके नसीब में पक्का यह लिख दिया जाता है कि आप एक दिन धोबी का कुत्ता बनोगे। ऐसे में मेरा मानना तो यही है कि कामयाब लेखक होने के लिए पहले वाले विकल्प को ही चुन लिया जाए। क्या हुआ अगर आप जिस की आलोचना करते हैं वह 2 से 4 बात सुना ही दिया तो दूसरी तरफ वाह वाह भी तो हो रहा होता है। मैं तो यही कहूंगा कि दामाद बनिए, मलाई खाइए और अपने जीवन काल में ही 2 से 4 अवार्ड पाइए। यह सब बढ़िया सलाह के बाद भी अगर आप न्यूट्रल रहना चाहते हैं तो रह लीजिए। मेरा क्या जाता है? परंतु इतना अवश्य ही विचार कर लीजिएगा कि मरने के बाद धोबी के कुत्ते की क्या गति होती है?
  एक बार उन सच्चे और महान साहित्यकारों का इतिहास उठाकर अवश्य देख लीजिए। कंधे में झोली लटकाए दमा के मरीज हो गए सारे। मरते वक्त तक खांसी की सिरप तक नसीब नहीं हो पाई। परंतु यदि चाटुकार लेखकों का इतिहास उठाकर देखा जाए तो बड़ा आश्चर्य होता है। उन्हें पैसा मिला, पुरस्कार मिला, प्रतिष्ठा मिला वह सब मिला जो उन्हें चाहिए था। अतः मैं तो अब भी यही कहूंगा कि आप लेखक हो तो राजनीति पर लिखो। जिसमें ंशब्दों मे चाटूकारिता का रस खूब भरा हो। जी भरके एक पार्टी की तारीफ करो और एक पार्टी को गाली मारो। किसी के द्वारा स्वयं की बड़ाई सुनो तो किसी के द्वारा गाली भी खाने की हिम्मत रखो तथा इस बीच नेताओं के प्लेट में बची हुई जूठन और मलाई घर के किसी पालतू कुत्ते की तरह चाटते रहो। इतना इनाम काफी है तुम्हारे वफादारी के लिए।

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here