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सब लोग आसमान छू लेना चाहते पर ऐसा करना किसी किसी के ही नसीब में होता है

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सब लोग आसमान छू लेना चाहते
सब लोग आसमान छू लेना चाहते पर ऐसा करना किसी किसी के ही नसीब में होता है
 शायद ही दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा जो सफल नहीं होना चाहता होगा अन्यथा मेरे हिसाब से तो हर आदमी अपने जीवन में सफल होना चाहता है तथा कामयाबी के नए नए आयाम छूनी चाहता है। यहां तक कि सफलता की भूख तब भी शांत नहीं होती जब आदमी सफल हो जाता है । सफल होने के बाद व्यक्ति किसी दूसरे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संघर्ष में लग जाता है। यानी सफलता की चाहत आदमी की फितरत में होती है। यहां एक बात ध्यान देने की बात यह है कि जब व्यक्ति जन्म लेता है तो वह सफलता असफलता के अनुभव से काफी सालों तक दूर रहता है । परंतु जैसे जैसे वह बड़ा होता जाता है वैसे वैसे वह दुनिया की होड़ में शामिल होता जाता है। इसी कंपटीशन में शामिल होकर वह निरंतर स्वयं को साबित करने का प्रयास करता है तथा बड़ी से बड़ी सफलता प्राप्त करना चाहता है।
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  खैर यह बात तो सच है कि सफलता दुनिया के सभी लोग प्राप्त करना चाहते हैं कोई भी इस चाहत से अछूता नहीं है। परंतु यह भी  शाश्वत सत्य है कि मेहनत कोई नहीं करना चाहता है और जो लोग यह जानते हैं कि उन्हें सफलता मेहनत के द्वारा ही मिलेगी वह लोग मेहनत करने की सोचते तो है परंतु मेहनत करना शुरू नहीं करते। बस सफलता की प्राप्ति इसी कारण नहीं होती है। सारी बात यहीं पर आकर अटक जाती है कि बिना परिश्रम के सफलता भला मिले भी तो कैसे मिले? ईश्वर ने मनुष्य को देखने, बोलने, सुनने, करने का सामर्थ्य इसलिए तो नहीं दिया कि मनुष्य हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे तथा परिश्रम करने से भागता रहे । भगवान ने तो आपको यह सब शक्तियां इसलिए दी है कि आप अधिक से अधिक मेहनत करके बड़ी से बड़ी सफलता प्राप्त करें। अतः आप यह इच्छा रखते हैं कि आपको  कामयाबी मिले तो मेहनत करने का जज्बा भी अपने दिल में रखिए। तभी आपको सफलता मिल सकेगी। इस संसार की कोई शक्ति नहीं रोक पाएगी आपको सफल होने से। आप अनवरत  ही दिन दुगुनी रात चौगुनी सफलता प्राप्त करते जाएंगे ।
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 अब करते हैं बात सफलता की लड़ाई में पराजय की। आदमी जब सफलता के लिए दौड़ लगाते लगाते पराजित हो जाता है तो उसके पराजय में किस्मत की भूमिका अधिक नहीं होती। बल्कि उसके द्वारा किए गए गलतियों की भूमिका अधिक होती है। दरअसल आप जब भी किसी काम को करना शुरु करते हैं तो उसे तन-मन से करना चाहिए तथा अपना शत प्रतिशत योगदान देना चाहिए। बहुत बार देखा गया है कि व्यक्ति संघर्ष तो करता है पर मनमौजी होकर करता है तथा आपना शत प्रतिशत योगदान नहीं देता। ऐसी स्थिति में वह सफलता प्राप्त नहीं कर पाता तथा स्वयं को कोसने लगता है और किस्मत को दोषी ठहराने लगता है। बाद में वह निराश होकर हार मान लेता है।
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  परंतु वास्तव में  सफलता के लिए किस्मत दोषी नहीं होता। दोषी तो केवल व्यक्ति की कुछ गलतियां होती है जिसमें उसके  आलस की भूमिका भी बहुत बड़ी होती है। अतः संघर्ष के समय आलस को एकदम त्याग दीजिए तथा अपना शत-प्रतिशत योगदान देते हुए दृढ़ संकल्प के साथ आप जो भी करना चाहते हैं उसे कीजिए। शुरुआत में कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ेगा पर बाद में सब ठीक हो जाएगा और धीरे-धीरे एक के बाद एक कामयाबी मिलने लगेगी। बाकी आगे हौसला इतना बुलंद हो जाएगा कि आप स्वत: ही नई नई ऊंचाइयां छूते चले जाएंगे। यदि आप कोई बहुत बड़ा संघर्ष कर रहे हैं तो आपको ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी सफल वह महान व्यक्ति के पीछे उसके भाग्य का हाथ नहीं होता बल्कि उसके परिश्रम तथा उसके दिमाग का कमाल होता है।

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