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अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हमारे सामने जाति व्यवस्था को त्याग कर एक समान होने के सिवा कोई चारा नहीं है

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जाति व्यवस्था

जातिवाद भारत में अनादि काल से चली आ रही है। इस व्यवस्था का प्रारंभ मनुस्मृति से होता है। दरअसल मनु ही है जो जाति व्यवस्था को मूर्त रूप में धरातल पर उतारा था। इस व्यवस्था को लागू करने के पीछे का मकसद तब देश में धर्म और समाज को सुचारु रुप से चलाने का था। तब ऐसा माना गया कि अगर समाज को कर्म के हिसाब से बंटवारा कर दिया जाए तो समाज का क्रियान्वयन सुचारु रुप से चलता रहेगा। इसलिए सारे समाज को उसके काम के हिसाब से जाति की संज्ञा देकर बंटवारा कर दिया गया। जिसमें सबसे पहले वर्ग का विभाजन किया गया पहला ब्राम्हण जो कि ज्ञान का संचार करने के लिए बनाया गया, दूसरा क्षत्रिय जो कि अपने बल सामर्थ्य के माध्यम से देश और प्रजा की रक्षा करने हेतु बनाया गया, तीसरा वैश्य जो कि व्यापार से संबंधित था और चौथा शुद्र जो कि सेवक के रूप में स्वीकार किया गया।

किंतु इन 4 वर्गों के होते हुए भी और बहुत सी जातियों का प्रादुर्भाव हुआ जिसकी संख्या सैकड़ों में ही नहीं बल्कि हजारों में है। खैर किसी भी व्यवस्था को थोप देना और उसकी प्रासंगिकता को समझना दो अलग बातें हैं। मैं इतिहास में नहीं जाना चाहता क्योंकि क्या फायदा बीते हुए कल को लेकर तर्क वितर्क करने का। परंतु एक जागरूक समाज का यह कर्तव्य है कि वह इतिहास में हुई गलत और सही फैसले को परखे और उस पर मंथन चिंतन करें। एक जागरूक समाज का सदस्य होने के नाते हम सब का कर्तव्य है कि हम इस बात को लेकर मंथन करें कि क्या वास्तव में जाति व्यवस्था जैसे व्यवस्था को मान्यता देना भारतीय संस्कृति और समाज के लिए उचित था। क्योंकि इतिहास पर नजर डालें तो हमें ज्ञात होता है कि जाति व्यवस्था का फायदा तो कम ही हुआ है परंतु नुकसान इतना ज्यादा हुआ है कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

क्या आपने सोचा है कि जाति व्यवस्था को कर्म और गुण के आधार पर बांटने के बाद इसे खून और खानदान तक सीमित कर दिया गया। जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पंडित का बेटा मूर्ख होते हुए भी पूज्य हो गया और शूद्र का बेटा बुद्धिमान होते हुए भी अधिकारों से वंचित रह गया। इसका परिणाम यह होगा कि आदमी ही आदमी का दुश्मन हो गया। जाति के नाम पर आज हम भले ही जाति के नाम पर सेखी बघारे किंतु वर्चस्व गुण का ही रहा है हमेशा।

हालांकि जाति के नाम पर प्रतिभा को दबाने की कोशिश की गई पर सारे प्रयास असफल रहे। एकलव्य आज भी महान है, करण आज भी महान है। क्या जाति का बंधन बांध पाया उनके प्रतिभा को? हिंदू समाज का यह दुर्भाग्य है कि उनको एक ऐसे संकीर्ण व्यवस्था मिली जिसके कारण वह हमेशा ही खाई में गिरते रहे। आप सोचिए क्या क्या नहीं हुआ है हमारे देश में जाति के नाम पर? जाति के नाम पर राजपूत ब्राह्मणों ने जो उपद्रव मचाया है वह किसी से छुपा नहीं है।

छोटे जाति वालों से घर में, खेतों में काम कराया जाता था। उनके हाथ से पैदा हुए फसल की रोटी खा लेते थे किंतु पानी छू दे तो नहीं पीते थे। छोटे जाति वालों को चारपाई पर नहीं बैठने दिया जाता था। अगर किसी दलित की बेटी नजर आ गई तो उसके साथ बलात्कार किया जाता था। एक बात हमें यहां बता देना चाहते हैं कि कितना गिरा हुआ सोच था हमारा कि दलित का छुआ हुआ खाए तो अपवित्र हो जाए और दलित की बेटी के साथ सोए तो कोई अस्पृश्यता नहीं। सवर्णों ने कितने अमानवीय कार्य किए हैं हमारे समाज में जिसका जिक्र किया जाने लगे तो एक ऐतिहासिक ग्रंथ तैयार हो जाए। सती प्रथा, विधवा विवाह, बाल विवाह जैसे और भी कुप्रथाएं रहे हैं देश में। किंतु हमें यहां खास तौर पर जाति व्यवस्था पर बात कर रहे हैं।

मैं बता दूं कि मैं इन सब चीजों का जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि हमारा समाज अपनी गलतियों से सीख कर आगे बढ़े। किसी को ठेस पहुंचाने का हमारा कोई मंशा नहीं है।

अब आप सोचिए तो जाति व्यवस्था का हमें कितना नुकसान हुआ है। कितने विदेशी आक्रमणकारीयों ने हमला किया और भारत को लूटा तब भी हम कुछ ना कर सके। इसके पीछे भी जाति व्यवस्था है। क्योंकि उस समय जितनी भी लड़ाइयां हुई उसमें पूरा भारतीय हिंदू समाज लड़ा ही नहीं। इसलिए हार का मुंह देखना पड़ा। उस वक्त युद्ध लड़ने का दायित्व क्षत्रियों के ऊपर था और दूसरे किसी को यह अधिकार ही नहीं था कि वह युद्ध कर सकें। यह मैं ठीक ठीक नहीं कह सकता कि क्षत्रियों ने औरों को युद्ध नहीं लड़ने दिया या फिर औरों ने युद्ध नहीं लड़ा क्षत्रियों ब्राह्मणों के साथ आंतरिक द्वेष के कारण। फिर भी यह तो तय है कि भारत की गुलामी के पीछे जाति व्यवस्था के कारण फैली आपसी बैर का बड़ा हाथ था।

अब हम इसे स्वीकार करें या ना करें। जरा सोच कर देखिए तो एक बार जब 21वी सदी में जातिगत विद्वेष इतनी है तो बीते जमाने में क्या हालात रही होगी? मेरी तो रूह भी कांप जाती है यह सब सोचकर। तब भी मैं यह कहना चाहूंगा कि अब हिंदू समाज को सारे बैर भूल कर एक हो जाना चाहिए। सबको आपसी सहमति से जाति व्यवस्था को ही खत्म कर देनी चाहिए। जाति व्यवस्था एक कैंसर है समस्त हिंदू समाज के लिए।

आप हजारों साल का इतिहास उठाकर देख लें जाति व्यवस्था जो जख्म पूरे हिंदू समाज को दिया है वह किसी अन्य कुरीति में नहीं दिया। हम जाति में बंटकर विदेशी आक्रमणकारियों के गुलाम रहे, हमारा अखंड भारत खंडित खंडित हो गया, तब भी हम वहीं के वहीं हैं। आज भी हम जाति के नाम पर लड़ते हैं। आपस में छोटे बड़े का भेदभाव करते हैं। जाति के नाम पर घिन करते हैं छूत अछूत का भेद करते हैं। जिसके कारण लगातार राष्ट्र विरोधी शक्तियां देश में पैर पसारतीं जा रही हैं।

जरा संभल के सोचिए कि भौगोलिक रूप से आज भारत टूट कर इतना सिकुड़ गया है कि एक छोटी सी गलती पूरे भारत के लिए खतरा बन सकती है। हमें आत्ममंथन करना चाहिए होगा। हमें एक होना ही होगा। अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हमारे सामने जाति व्यवस्था को त्याग कर एक समान होने के सिवा कोई चारा नहीं है। हम सब एक हैं समान हैं भाई हैं यही हमारा उद्देश्य और मूल मंत्र होना चाहिए।

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