आदमी उम्मीदों के पीछे भागता रहता है परंतु उम्मीदें सभी पूरी नहीं होती होता वही है जो ईश्वर चाहता है

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आदमी उम्मीदों के पीछे भागता रहता है
आदमी उम्मीदों के पीछे भागता रहता है परंतु उम्मीदें सभी पूरी नहीं होती होता वही है जो ईश्वर चाहता है
आदमी की सोच हमेशा उम्मीदों से भरी होती है। वह हर वक्त उम्मीदें लगाए रहता है। यह उम्मीदें अधिकतर सकारात्मक होती है तथा उसे आगे बढ़ाने में सहायता करती है। दुनिया की समंदर में आदमी जिंदगी की नाव पर बैठा हुआ उम्र का सफर निरंतर तय करता है।
आदमी उम्मीदों के पीछे भागता रहता है परंतु उम्मीदें सभी पूरी नहीं होती होता वही है जो ईश्वर चाहता है
 ऐसे में कई बार उम्मीदें पूरी भी हो जाती है और आदमी को खुश होने का अवसर दे जाती है। मगर कई बार यही उम्मीदें टूट भी जाती हैं जिससे आदमी निराश हो जाता है। परंतु कुछ दिनों तक निराश और दुखी रहने के पश्चात आदमी पुनः किसी न किसी उम्मीद की उंगली पकड़ लेता है। अब करें भी तो क्या करे बेचारा आदमी? उम्मीदों के सहारे ही तो जिंदगी काटनी है। अतः एक उम्मीद समाप्त होते ही नई उम्मीद ढूंढकर सहारा ले लेता है।
आदमी उम्मीदों के पीछे भागता रहता है परंतु उम्मीदें सभी पूरी नहीं होती होता वही है जो ईश्वर चाहता है
  हर जीवन में उम्मीद और सपनों का सिलसिला लगा रहता है। आते जाते रहते हैं यह सब । कई बार कुछ पूरे हो जाते हैं तो कई बार कुछ अधूरे रह जाते हैं। अतः इनका आप कुछ नहीं कर सकते। अगर हम से पूछेंगे कि इनका क्या करें तो मैं तो यही जवाब दूंगा कि भाई जो अधूरे रहे उन से सबक ले लीजिए और जो पूरे हो गए उनका आनंद लीजिए। इसके सिवाय भी आदमी के हाथ में होता क्या है?
आदमी उम्मीदों के पीछे भागता रहता है परंतु उम्मीदें सभी पूरी नहीं होती होता वही है जो ईश्वर चाहता है
 आप की उम्मीदें आप के सपने लूटेंगे और सहेजेगेंं भी। इसी का नाम जिंदगी है। अतः अगर आप ऐसा सोचते हैं कि इस प्रक्रियाओं से आप बच जाएंगे तो आप भूल कर रहे हैं। ऐसा ना हुआ है ना कभी होगा। बड़े से बड़े सौभाग्यशाली आदमी के उम्मीदों में भी कुछ ना कुछ कमी रह ही जाती है। अतः इसे लेकर चिंतित नहीं होना चाहिए। सोचना चाहिए कि जो नियति में लिखा होगा वही होगा। आप बस कर्म करते रहिए।
हर उम्मीदें आज तक किसी की पूरी नहीं हुई। भगवान राम को यह उम्मीद थी कि रावण सीता को वापस कर देगा तो युद्ध नहीं करना पड़ेगा पर रावण ने एक भी ना सुनी। भगवान श्री कृष्ण  भी उम्मीद लेकर दुर्योधन के पास गए थे कि पांडवों को रहने के लिए 5 गांव ही मिल जाए ताकि युद्ध ना हो और करोड़ों लोगों की जान बच जाए परंतु दुर्योधन ने भी सुना ही कहा था। यानी उम्मीदें तो भगवान की भी नहीं पूरी हो सकी।
अतः हम सब कितना भी सोचे विचारे कुछ भी करना चाहे पर वही होता है नियति ने जो पहले से निश्चित कर दिया है। इंसान ना ही उससे ज्यादा कुछ कर सकता है और ना ही उससे कम।
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