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कैसा है भारत में धर्मनिरपेक्षता का स्वरुप? समय के साथ बहुत ही बदल चुका है सर्वधर्म समभाव वाले भारत में धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप

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सर्वधर्म समभाव
“सर्वधर्म समभाव” यानी कि सभी धर्मों को समान भावना वाले चश्मे से देखना और सभी धर्मों में सामंजस्य बनाए रखना। यही भारतीय संस्कृति है यही भारतीयता है और वास्तव में यही मानवता भी है। सर्वधर्म समभाव की अवधारणा को बचाए रखना प्रत्येक भारतीय का उत्तरदायित्व है। वैसे भी मेरा मानना है कि इस अवधारणा को बचाए रखने में अब तक भारतीय जनता ने कोई कोर कसर भी  नहीं छोड़ी है। यही वह अवधारणा है जिसकी नींव पर सवा अरब से ज्यादा विभिन्न पंथी और संप्रदायों में बंंटा हुआ देेश एक है। भारत में जितनी विभिन्नता है उतना अन्य किसी जगह नहीं। संसार में जितने धर्म संप्रदाय और जाति को मानने वाले लोग हैं वह भारत में अवश्य ही मिलेंगे। इस नजरिए से देखा जाए तो भारत सभी धर्मों के मानने वाले लोगों का निवास स्थल है, जोकि अपने आप में एक मिसाल है। किंतु कुछ मामलों में इस अवधारणा को लगातार ठेस पहुंच रही है। लगातार कई तरफ से इस पर चोट किया जा रहा है जिससे ऐसा लगने लगा है कि देश में यह धर्मनिरपेक्षता खत्म ना हो जाए। दरअसल जब से कुछ राजनीतिक पार्टियों ने अपने राजनैतिक अभिलाषा को साधने के लिए धर्म को हथकंडा के रूप में अपनाना शुरू किया है तब से यह समस्या प्रकट हुई है। यहां पर मैं बता दूं कि मैं किसी भी राजनीतिक पार्टी का नाही पक्ष ले रहा हूं और ना ही आलोचना कर रहा हूं। क्योंकि कोई भी पार्टी सर्वधर्म समभाव के अवधारणा पर खरी नहीं उतरती। सभी पार्टियों ने धर्म को अपने अपने हिसाब से उपयोग किया है। कुछ पार्टियां हिंदुओं का ठेकेदार बनी बैठी है तो कुछ पार्टियां मुस्लिमों का और सभी साधु, मौलवी भी अपने अपने हित साधने में कहीं पीछे नहीं दिखते। धर्म को राजनीतिक अखाड़े में लाने से सर्व धर्म समभाव की जो मूल धारणा है उस में असंतुलन उत्पन्न हो गई है। लोगों के विचार धारा को खास रंगों में रंग दिया गया है। पहले सभी लोग मिलकर रहते थे चाहे उनका धर्म और संप्रदाय कुछ भी हो, जो कि आज वही लोग एक दूसरे को नफरत की निगाह से देखने लगे हैं। तो क्या भारतीय लोगों में बढ़ रहे इन दूरियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि सर्व धर्म समभाव की अवधारणा खतरे में है। मैं ऐसा तो पूर्णरूपेण नहीं कह सकता किंतु इतना जरूर कहूंगा कि जब से धर्म को राजनीतिक में महत्व दिया जाने लगा है तब से सर्व धर्म समभाव की अवधारणा कमजोर अवश्य होने लगी है।

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