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जाति धर्म के नाम पर वोट लेना बन गया है  वर्तमान में भारतीय राजनीति का उद्देश्य

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 मैं यह तो साफ तौर पर नहीं कह सकता कि आजादी के बाद से भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता और जातिवाद का कितना वर्चस्व रहा है और कौन-कौन सी पार्टियां सांप्रदायिकता जातिवाद और वोट बैंक की राजनीति करती है। किंतु वर्तमान के परिपेक्ष में मैं अवश्य ही कहूंगा कि फिलहाल सभी ही पार्टियां जाति, धर्म, वोट बैंक तथा संगठनों की राजनीति में लिप्त है।
 प्रत्येक भारतीय राजनीति पार्टियां अपने अपने एजेंडे के मुताबित इन चुनावी हथकंडों का इस्तेमाल कर रही हैं। भारतीय लोकतंत्र का यह एक सच्चाई है कि यहां के चुनाव जब भी कहीं संपन्न होते हैं तो उसमें 80 से 90 फ़ीसदी वोट जाति, धर्म, वोट बैंक और संगठन के आधार पर पड़ते हैं। इस बात को किसी भी अवस्था में झुठलाया नहीं जा सकता। भले कुछ अपवाद प्रस्तुत किए जा सकते हैं मैं इससे इनकार नहीं करता। लेकिन कुछ अपवादों को किनारे रख दिया जाए तो यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि भारत के सभी पार्टियों का वजूद लगभग लगभग जिंदा ही जात, धर्म, वोट बैंक और संगठन के बुनियाद पर है। जो कि भारतीय लोकतंत्र को दीमक के भांति खोखला किए जा रही है।
 जब भारत में लोकतंत्र की स्थापना हुई थी तब शायद किसी को भी यह अनुमान नहीं होगा कि इस तरह की भी कोई दुर्व्यवस्था भविष्य में स्थापित हो जाएगी। किंतु हुआ जो वह आप देख सकते हो। शायद संविधान सभा के सदस्यों को यह अनुमान पहले से ही लग गया होता तो कोई ना कोई ऐसी व्यवस्था जरूर की गई होती जिससे इस तरह की त्रुटि पर अंकुश लग पाता। किंतु अब पछताए क्या होत है जब चिड़िया चुग गई खेत।
 खैर जो हुआ सो हुआ पर अब से भी सुधार अवश्य किया जा सकता है। किंतु प्रश्न यह है कि अब करेगा कौन? आज के राजनेता की रोटी ही जब  इसी के आधार पर चलती है फिर वह ऐसा क्यों करेगा, जिससे सांप्रदायिकता और जातिवाद जैसी बीमारी से देश को निजात मिले? मेरा मानना है कि वह ऐसा कभी नहीं करेगा।
 आज के प्रत्येक नेता के भाषण में जाति धर्म का उल्लेख होता है। वोट मांगा भी इसी बुनियाद पर जाता है और वह वोट कांटा भी इसी बुनियाद पर जाता है। और तब भी काम बनते नहीं दिखता तो दंगे भड़का दिए जाते हैं, द्वेष फैला दिया जाता है, जिसके परिणाम स्वरुप जनता आपस में मरती है और राजनीति AC में बैठकर मौज करती है।
 खैर यह जो भी हो रहा है ठीक नहीं हो रहा। हमारे जनप्रतिनिधियों द्वारा यह सब फौरन बंद किया जाना चाहिए। जो वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं वह वोट बैंक की राजनीति बंद करें। जो जाति धर्म की राजनीति कर रहे हैं वह जाति धर्म की राजनीति बंद करें । क्योंकि ऐसा करना भविष्य में देश के लिए घातक सिद्ध होगा।

 यहां मैं बताता चलूं कि कोई भी राजनीतिक पार्टी दूध का धुला नहीं है। सब अपने अपने हिसाब से ओछी  राजनीति करते हैं। परंतु मेरा निवेदन है कि सभी पार्टियों को स्वच्छ राजनीति करते हुए देश के भलाई का काम करना चाहिए। भारतीय राजनीति का काम देश को तोड़ना नहीं बल्कि देश को जोड़ना होना चाहिए। यही 130 करोड़ जनता के हित में है। यही भारतवर्ष के हित में है।

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