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धीरे-धीरे मैं इस प्रकार बढा भोजपुरी साहित्य के तरफ वरना पहले मैं सिर्फ हिंदी साहित्य में ही रुचि रखता था

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मेरी मातृभाषा भोजपुरी रही और भोजपुरी साहित्य में भी मेरी रुचि थी परंतु वस्तुतः में हिंदी पढ़ा लिखा हुआ व्यक्ति था सो जब हमारे ह्रदय में साहित्य का अंकुर फूटना प्रारंभ हुआ तो हिंदी में ही हुआ। मैं साहित्य लिख पाऊंगा कि नहीं इस असमंजस को दिल में दबाए जब मैं अपने डगमगाती हाथों में कलम थामा कुछ लिखने के लिए तब हमारी पहली पसंद भाषा के तौर पर हिंदी ही थी। लिखा तो अच्छा लगा फिर उसे पढ़ा तो और अच्छा लगा लेकिन जब बार-बार पड़ा तो बहुत ही खामियां नजर आईं । श्रेष्ठ जनों ने भी मेरे द्वारा लिखी गई साहित्य को पढ़कर त्रुटियों से आगाह किया और मैं ना जाने किस मिट्टी से बना था जो कि हार नहीं मानने वाला था। इसलिए मैं निरंतर प्रयास करता रहा और अंततः एक दिन वह भी आया जब मैं पारंगत हो गया।

 इस बीच भोजपुरी साहित्य या भाषा भी मेरे लिए उतनी ही प्रिय रही जितना कि हिंदी। क्योंकि मेरी जिंदगी की शुरुआत ही भोजपुरी से हुई। शायद मेरे माता-पिता ने जब मुझे बोलना सिखाया होगा तब मेरे आधार से फूटा हुआ शब्द भोजपुरी का ही रहा होगा। जीवन में कभी ऐसा ना हुआ और ना होगा जब मैं अपने भोजपुरी भाषा से दूर होऊंगा। भोजपुरी हमारी मातृभाषा है, सरल है, सुगम है, मधुर भी है। इस के सानिध्य में रहना मां के आंचल के साए में रहने के जैसा है।
 भोजपुरी साहित्य से इतना लगाव होते हुए भी मैं भोजपुरी में साहित्य सृजन नहीं कर सकता था। दरअसल इसके पीछे मेरी विवशता थी। मेरे मित्र श्री प्रभु दयाल गुप्ता सूरज पुरी जी जो कि भोजपुरी के फिल्मों के उम्दा गीतकार हैं उन्होंने मुझे अनेकों मर्तबा प्रोत्साहित किया भोजपुरी में लिखने के लिए। किंतु मैं भोजपुरी संवेदना को हृदय में संभाले होने के उपरांत भी भोजपुरी साहित्य से इतना कटा हुआ था कि मैं भोजपुरी नहीं लिख पाता था। खैर भोजपुरी लिखने में बड़ी ही समस्या भी थी। मैं जब भी किसी भोजपुरी रचना को पूर्ण करने का प्रयास करता तब तुकबंदी करने में बड़ी कठिनाई आती थी। जैसे-जैसे तुकबंदी कर भी लेते थे तो हमारी ही रचनाएं हमारी मजाक से उड़ाने लगती। दरअसल रचना मुझे स्वयं को ही हिंदी उर्दू संस्कृत भोजपुरी का घालमेल लगने लगता है। तब मुझे लगता कि मैंने जो भी लिखा है वह भोजपुरी नहीं है। भले ही मैंने इसे भोजपुरी समझकर लिखा है। ऐसे में मेरे लिए भोजपुरी को हिंदी संस्कृत और उर्दू से दूर रख पाना बेहद ही दुष्कर था। अतः मैं हार मान लिया कि भोजपुरी में लिखना मेरे बस की बात ही नहीं है। वह लोग बहुत बड़े बुद्धिजीवी होते होंगे जो खांटी भोजपुरी में लिखते होंगे। मैं तो उस स्तर का हूं ही नहीं।
 इसी हीन भावना के कारण मुझे लाख इच्छा होते हुए भी मुझे भोजपुरी साहित्य सर्जना को त्यागना पड़ा। भले ही मेरे जीवन का एक-एक पल भोजपुरी बोलने और भोजपुरी को जीने में गुजर गया था। माता-पिता भाई-बहन मित्र मेहमान हर जगह हम भोजपुरी ही बोलते थे। किंतु यह बदनसीबी ही कहेंगे कि जिस भाषा ने मुझे दुनिया से वाकिफ कराया उसी में मैं खुद को कमजोर  समझता था। हिंदी तो बस स्कूलों में ही व्यवहार में लाई जाती थी। फिर भी मैं हिंदी को कुछ ज्यादा व्यवहारिक समझता था। हालांकि तब भी सूर तुलसी कबीर मीरा जयशंकर प्रसाद  महादेवी वर्मा की कविताएं सर के ऊपर से निकल जाती थी। बिल्कुल वैसे ही जैसे मुंडन के बाद ऊपर से पानी निकल जाता है। किंतु अपवाद यह रहा की कविताएं कितना ही समझने में गोबर गणेश रहा पर प्रेमचंद्र जयशंकर प्रसाद की कहानियां समझने में उतना ही हर-हर गणेश रहा। खैर हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है यह सौभाग्य है मेरा कि हिंदी हमारे लिए बेहद सरल और स्वभाविक रहा है।
 हम बात कर रहे थे भोजपुरी की। मैं हिंदी साहित्य की रचना करता रहा और साथ-साथ भोजपुरी साहित्य के आग को भी सीने में जलाए रखा। काफी प्रयत्न किया की भोजपुरी साहित्य की कोई पुस्तक प्राप्त हो जाए जिसे पढ़कर प्रतिभा दिखा सकूं। पर जिस परिवेश में था वहां ऐसी पुस्तक को प्राप्त करना निसंदेह ही असंभव था। कितने ही बुक स्टालों पर गया की कोई भोजपुरी पुस्तक प्राप्त हो पर ना मिला।  धीरे-धीरे कई साल निकल गए मैं भी कुछ और बड़ा हो गया बढ़ती उम्र के साथ प्रतिभा के चमक में भी बढ़ोतरी हुई इंटरनेट का युग आ गया लोग ऑनलाइन कनेक्ट होने लगे हर प्रकार की जानकारी Google पर सर्च करके प्राप्त की जाने लगी। तब तक अचान मैं  नौकरी के लिए विदेश चला गया। लिखने के लिए पढ़ना बेहद जरूरी होता है। उस समय मेरे पास विदेश में किताब नहीं थे हिंदी के। तब समस्या तो लगा किंतु इस समस्या का समाधान मुझे इंटरनेट के रुप में मिल गया। फिर क्या था यहां एक से  एक रचनाएं पड़ता गया साथ-साथ सृजन जारी रहा।
 इस बीच अचानक एक दिन मैंने Google पर भोजपुरी कविता सर्च किया फलस्वरूप जो भी कविताएं पढ़ने को मिला वह बहुत ही दोयम दर्जे का था। जिससे मैं संतुष्ट नहीं हो सका। सच कहूं तो मैं जिस प्रकार की भोजपुरी कविता लिखता था उसके 20% भी उनके कविताओं में गुणवत्ता नहीं थी। भोजपुरी साहित्य की यह स्थिति देखकर मैं निराश हुआ और  सृजन की भोजपुरी सोच को मन से निकाल दिया। इस बीच हिंदी लेखन अनवरत चलता रहा धीरे-धीरे समय निकलता गया ।
 इस तरह सालों बीत गए करीब 2 साल के करीब गुजरा। तब तक मैं इंटरनेट का कीड़ा बन गया था। तरह तरह की ज्ञान की चीजें ढूंढता रहा था। अचानक एक बार फिर खयाल आया और मैंने पुनः  भोजपुरी कविता सर्च किया। इस बार मैं मनोज भावुक डॉट कॉम पर था। मैंने उनकी कुछ रचनाएं पड़ी दिल को छू गया। इंटरनेट पर ही उनके परिचय और योगदान के विषय पर सर्च किया। सच कहूं तो जो मिला वह बहुत ही सराहनीय था। धीरे-धीरे अचानक एक दिन भोजपुरी कविता कोश तक पहुंच गया। वहां अनेको रचनाएं पढ़ने को मिली। मैंने खूब पढ़ा इतना पढ़ा कि अंदर भोजपुरी साहित्य की लहर जाग उठी।
लेखक: संजय कुमार मौर्य 

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