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राजनीति में नेता जनता की सेवा करें, भ्रष्टाचार छोड़े, सत्ता के दुरुपयोग का त्याग करें, नेता की छवि के साथ-साथ देश का छवि भी उज्जवल होगा।

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 राजनीति का ऊंट कब किस करवट बैठे कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यहां कोई किसी का दोस्त नहीं होता और ना ही कोई किसी का दुश्मन। यहां पर केवल सत्ता की कुर्सी ही मायने रखती है। यानी कि सत्ता जिस भी प्रकार प्राप्त हो वह उचित होता है।
किंतु भारतीय लोकतंत्र शायद सारी दुनिया की लोकतंत्र की अपेक्षा एक परिपक्व लोकतंत्र रही है। यहां भले ही सत्ता के लिए दल बदले जाते हो सीट खरीदी जाती हो लेकिन राजनीतिक शिष्टाचार हमेशा ही कायम रहा है।
मीडिया और जनता के सामने आरोप प्रत्यारोप तो चलता ही रहता है। कभी-कभी तो भाषा की स्तर ही इतनी गिर जाती है की मर्यादा का कोई ख्याल ही नहीं रहता। इन तमाम तरह की दुर्व्यावहारिक राजनीतिक घटनाओं से तो देश का लोकतंत्र कई बार शर्मसार हो चुका है और होता भी रहता है। परंतु इसके विपरीत यह भी एक सच्चाई है कि बहुत सारी कटुता के बाद भी यह नेता  जब भी एक दूसरे से जनता की आंखों से ओझल किसी गली में मिल जाते हैं तो गर्मजोशी से कुशल क्षेम में लेते हैं, गले भी मिलते हैं, हाथ भी मिलाते हैं।
 यानी जो हम टीवी चैनलों पर एक दूसरे पर बयानों का बाण छोड़ते नेताओं को देखते हैं वह केवल राजनीति का स्वरुप होता है। इसे ही हम लोकतंत्र कहते हैं। पर्दे के पीछे तो सारे नेता एक ही होते हैं। संभव है कि जब कोई देश हित में बड़ा निर्णय लेना होता है तो सत्ता पक्ष और विपक्ष के सहमति से ही लिया जाता है। यह अच्छा भी है। सभी राजनीतिक दलों को सत्ता से परे हटकर देश हित में ऐसे ही काम करना चाहिए।
देश वास्तव में इसी प्रकार आगे बढ़ेगा। वैसे विभिन्न प्रकार के विरोधाभास होते हुए भी हमारे नेता एकजुट रहेंगे तो लोकतंत्र और भी मजबूत होगा और लोकतंत्र जितना मजबूत होगा देश भी उतना ही फुलेगा फलेगा। यह भारतीय प्रजातंत्र के लिए शुभ संकेत है।
परंतु हमारे देश के नेतागण को यह ध्यान रखना होगा कि राजनीतिक विरोध करते समय मर्यादा का ध्यान रखते हुए भाषा पर संयम बरती जाए। वैसे हमें तो आचरण हीन राजनीति को राजनीति की संज्ञा देने में ही आपत्ति है। एक शिक्षित समाज में अमर्यादित राजनीति को स्वीकार किया ही नहीं जा सकता।
इसलिए राजनेता शुद्ध और सकारात्मक राजनीति करें तो बेहतर होगा और जन जन को स्वीकार्य भी होगा। अमर्यादित राजनीति करने से नेता का चरित्र तो धूमिल होता ही है साथ-साथ राष्ट्र का छवि भी खराब होता है। सो यह नेताओं का दायित्व बनता है कि वे स्वयं के साथ-साथ देश के छवि का भी सम्मान बनाए रखें।
 कोई भी लीडर तब तक लीडर नहीं कहा जा सकता जब तक वह लीड नहीं करता। नेता जनता का सेवा करें, भ्रष्टाचार छोड़े, सत्ता के दुरुपयोग का त्याग करें, नेता की छवि के साथ-साथ देश का छवि भी उज्जवल होगा।

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