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बहुत ही महत्वपूर्ण होता है आदमी के जिंदगी में प्यार,  बेहद खूबसूरत होती है प्रेम की महिमा

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प्यार
 प्यार वह चीज है जिस की परिभाषा कभी भी पूर्ण नहीं होने वाली। इस दुनिया में जितने भी लोग आए उतने ही लोगों ने प्यार को अपने अपने तरीके से जाना है और उसे महसूस किया और उसके बारे में कुछ न कुछ अवश्य ही कहा। अब यह बात अलग है कि सब के द्वारा कहे गए प्रेम के विषय पर के शब्दों का कहीं भी उल्लेख नहीं है। किंतु मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि प्रेम ही एक ऐसा विषय है जिस पर हर आदमी की अपनी एक व्यक्तिगत राय होती है। प्रेम ही तो वह शब्द है जिसको केवल बड़े बड़े ज्ञानी ही नहीं परिभाषित करते अपितु  अनपढ़ और मूर्ख भी कुछ ना राय जरूर रखते हैं। प्रेम पर यह अलग तथ्य है कि ज्ञानियों के द्वारा कहे गए किसी बात को इतिहास के पन्नों में शामिल कर लिया जाता है और अनपढ़ लोगों द्वारा कही गई बात को कहीं जगह नहीं मिलती है।
 हम बात कर रहे थे प्रेम पर। यह प्रेम जो है ना अथाह है, असीमित है, आमाप हैं। बिल्कुल सृष्टि की तरह। जिस प्रकार मनुष्य इस संसार को जितना देख-सुन और महसूस कर पाता है और उसके बाद उसे व्यक्त करता है ठीक  ऐसा ही प्यार के मामले में भी है। आदमी प्रेम को जितना जानबूझ पाता है उतना ही व्यक्त करता है । किंतु है तो यह विपुल। जाने मुझे क्यों लगता है कि प्यार को असंख्य लोगों ने परिभाषित किया और असंख्य लोग परिभाषित करेंगे फिर भी इसकी परिभाषा खत्म नहीं होगी? खैर मेरा मानना है कि इसे व्यक्त करने में या तो शब्द कम पड़ जाएंगे या फिर संसार के प्रत्येक पार्ट पर इसके किस्से लिखे जाएं तो कहीं रिक्त स्थान न रहेगा।  यह है प्रेम की महिमा ।
 मैं बता दूं कृष्ण और राधा ने जो प्रेम किया वह प्रेम ही था। लैला और मजनू ने जो किया वह भी प्रेम ही था। हीर और रांझा ने जो किया वह भी प्रेम ही का रूप है। रोमियो और जूलियट का प्रेम भी प्रेम ही था। किंतु प्रेम वह भी था जो मीरा ने कृष्ण से की। तुलसी ने राम से की। कबीर ने परमात्मा से की। सूर, रहीम और रसखान ने जो प्रभु के आगे अपनी भक्ति को समर्पित किया वह भी प्रेम ही था। श्रवण कुमार ने अपने माता पिता को कंधे पर लेकर जो तीर्थ कराएं वह अपने आप में प्रेम का अनुपम उदाहरण है। कहने का मतलब प्यार का कोई खास प्रतीक नहीं होता। प्रेम किसी से भी हो सकता है। प्रेम मां-बाप, ईश्वर, भाई, बहन, पत्नी, मित्र, गुरु,  फूल, पौधे, जानवर, पक्षी, चांद, तारे या कहें कि प्रकृति के किसी रूप से हो सकता है।
प्रेम की अनुभूति मन के आनंद की अनुभूति है। जिसका कोई सानी नहीं। किंतु आजकल प्रेम को सिर्फ एक युवक और एक युवती के प्रेम से जोड़कर देखा जाता है जो कि बिल्कुल ही गलत है। प्रेम तो वह अनुभूति है जिसे प्रत्येक रिश्ते में अनुभव किया जा सकता है। प्रेम जिस्म के स्पर्श का नाम नहीं है प्यार तो एक दूजे के एहसासों के  छुअन का नाम है।

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