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राजनीतिक परिवर्तन के कभी भी एक कारण नहीं होते जब भी किसी राज्य में राजनीतिक उथल-पुथल होता है तो उसका कारण किसी एक प्रक्रिया को नहीं दिया जा सकता 

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: संजय कुमार मौर्य
राजनीतिक परिवर्तन के कभी भी एक कारण नहीं होते। जब भी किसी राज्य में राजनीतिक उथल-पुथल होता है तो उसका कारण किसी एक प्रक्रिया को नहीं दिया जा सकता है।
 राजनीतिक परिवर्तन में अगर सही तरीके से कारणों को ढूंढा जाए तो मिलेगा कि इसके पीछे अनेकों प्रक्रियाओं का हाथ होता है। यदि सही-सही इसका आकलन किया जाए तो अनेकों उदाहरण मिल जाएंगे।
 (1)  धर्म ————
आजकल राजनीति में धर्म का सबसे बड़ा योगदान है। चुनाव आते ही एक दूसरे धर्म को शब्दों से अपमानित किया जाता है और असंतोष का माहौल फैल जाता है। धार्मिक स्थलों को तोड़ा जाता है, देवताओं का अपमान किया जाता है, हजारों लोगों को बेघर हो जाना पड़ता है, अनेकों बेगुनाह मारे जाते हैं, और इसी के फलस्वरुप धर्म आधारित राजनीति की बुनियाद पड़ती है।
 फिलहाल भारतीय राजनीति में धर्म सबसे बड़ा फैक्टर बनकर उभरा है। आप तो जानते ही हैं कि धार्मिक भावनाएं प्रत्येक व्यक्ति की धमनियों में घुली हुई होती है। इसलिए धार्मिक राजनीति का सिक्का चलना लगभग तय होता है। यदि राष्ट्रीय परिपेक्ष में देखा जाए तो आजकल ज्यादातर वोट धर्म के नाम पर पड़ रहे हैं और निर्णायक भूमिका अदा कर रहे हैं।
 यहां मैं बता दूं कि मैं किसी एक धर्म के बारे में नहीं कह रहा। क्योंकि वर्तमान में सभी धर्म के लोग अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से झुंड बनाकर वोट करते हैं। इस मामले में कोई धर्म किसी धर्म से 19 नहीं है।
 (2)   जाति ————–
राजनीति में जातिवाद की भूमिका भी कम नहीं है। जातिगत राजनीति का प्रभाव खासकर छोटे चुनाव में ज्यादा दिखाई पड़ता है। किंतु राज्य स्तर के चुनाव तक भी इसका प्रभाव उतना ही है। आमतौर पर देखा गया है कि  राजनीतिक पार्टियां राष्ट्रीय स्तर के चुनाव तक में भी टिकट बेचते समय उम्मीदवार के धर्म के साथ-साथ जाति की भी अधिक ख्याल रखती हैं। इसका कारण यह है कि ग्रामीण इलाकों से ज्यादातर जाति के नाम पर वोट एकमुश्त पड़ते हैं। अतः किसी भी राजनीतिक परिवर्तन में जातीय प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। कई राज्यों में तो जातीय समीकरण के आधार पर ही सरकारें बन जाती हैं।
 ( 3 ) ध्रुवीकरण—————–
ध्रुवीकरण का भी कुछ कम प्रभाव नहीं है राजनीतिक पटल पर। ध्रुवीकरण तो आजकल राजनीति में एक ऐसा योद्धा बनकर उभरा है कि यह किसकी ओर से ताल ठोक दे जीत सुनिश्चित ही है। बड़े-बड़े राजनीति के पंडितों का आकलन भी ध्रुवीकरण के आगे पानी भरने लगते हैं। यह राजनेताओं द्वारा चला गया वह चाल है जो हारी हुई बाजी को भी जीत में तब्दील कर देता है। हालांकि ध्रुवीकरण मूलतः धर्म आधारित राजनीति का ही एक रूप है। पर यह धर्म तक ही सीमित ना होकर विस्तृत है। ध्रुवीकरण धर्म, जाति, भाषा, प्रांत, राष्ट्रवाद, समूह, संगठन और विचारधारा के आधार पर भी होता है। दरअसल समाज भी जितने ही विभागों में बटां है, उतने ही स्तर पर अपने-अपने आवष्यकताओं और हितों के आधार पर ध्रुवीकृत होता है।
( 4 )  तुष्टिकरण ————-
बहुत सी पार्टियां आजकल तुष्टीकरण को चुनाव जीतने के हथकंडे के रूप में प्रयोग करती हैं। हालांकि तुष्टीकरण भी धार्मिक आधार पर ही होता है, पर जाती और समूह तक भी इसका विस्तार है। धर्म की राजनीति की तरह तुष्टिकरण की राजनीति भी बेहद खतरनाक है। तुष्टीकरण के आधार पर जब जब कोई पार्टी सत्ता में आई है तब तक सत्ता पर सवालिया निशान लगे हैं। तुष्टिकरण के लिए नेता मूक होकर एक ओर सब देखते रहते हैं और दूसरी ओर एक धर्म, जाति या विशेष संगठन के लोग कानून अपने हाथ में ले लेते हैं। खैर टुष्टिकरण भी राजनीति का वह हथकंडा है जो नेताओं को सत्ता दिलाने में बेहद कारगर भूमिका अदा करता है। इसलिए यह भी एक राजनीतिक परिवर्तन के कारणों में से ही है।
 (5) भाषा ————-
भाषा का भी कम योगदान नहीं रहा है राजनीतिक परिवर्तन को स्थापित करने में। भारत में 23 संवैधानिक मान्यता प्राप्त भाषाएं हैं। इनमें से कई भाषाओं को देश की आजादी के बाद मान्यता प्राप्त हुई है, जिसमें भाषाई राजनीति और भाषाई आंदोलन का बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज भी बहुत से राजनेता चुनाव आते ही भाषा आधारित राजनीति शुरु कर देते हैं। खासकर उन भाषाओं के लिए जो किसी कारणवश अभी तक संवैधानिक दर्जा नहीं प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि भाषा की राजनीति को भारतीय राजनीति से दरकिनार नहीं किया जा सकता।
 (6)  संगठन —————–
हालांकि राजनीतिक पार्टियां स्वयं अपने आप में एक संगठन होती हैं। तो जब भी राजनीतिक संगठन के आधार पर आका जाएगा तो उन संगठनों को ही तरजीह दी जाएगी जो राजनीतिक संगठन ना होते हुए भी राजनीति को पूर्णता प्रभावित करती है। इनमें ज्यादातर धार्मिक संगठन आते हैं जो चुनाव आते ही एक खास पार्टी को जिताने के लिए कैंपेन शुरू कर देते हैं। खैर यहां मैं किसी भी संगठन का नाम नहीं लेना चाहूंगा क्योंकि इनकी तादाद इतनी है कि एक लेख में विस्तारपूर्वक समझ पाना संभव ही नहीं है। किंतु यह बता देना चाहूंगा कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा समर्पित यह संगठन बड़े ही प्रभावी और मजबूत होते हैं। जो चुनाव की दशा और दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
  तो यहां तक जानने के बाद हम निश्चिंत होकर कह सकते हैं कि राजनीति के किसी भी प्रकार के परिवर्तन में बहुत से कारण होते हैं। किसी एक कारण के आधार पर राजनीतिक परिवर्तन का सही आकलन नहीं किया जा सकता।

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