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साहित्य एक ऐसा क्षेत्र है जहां शिक्षा नहीं बल्कि आप की संवेदना और विचार मायने रखते हैं

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 साहित्य

मैं जब नौवीं क्लास में पढ़ता था तभी अचानक साहित्य की ओर आकर्षित हुआ। तब मुझे अखबार पढ़ने की बहुत शौक थी। मैं जब भी मार्केट जाता था तो किसी चाय या पान की दुकान पर बैठकर पेपर पढ़ लिया करता था।

एक-दो घंटे मैं पेपर पढ़ने किताबों की दुकान पर भी जा सकता था। परंतु मुझे वह स्थान कभी भी नहीं भाया जहां पढ़े-लिखे लोगों का आना जाना होता है। हलाकि पढ़ाई में मेरी रुचि थी किंतु केवल अखबारों की पढ़ाई में। स्कूल वाले पढ़ाई से मुझे सांप और नेवले जैसी सी ही कुछ दुश्मनी थी।

 परंतु अखबारों में राजनीति, बॉलीवुड की खबरें, कविताएं, शायरी, चुटकुले मुझे बेहद पसंद आते थे। इसलिए मैं अखबारों की तरफ बढ़ चला और स्कूल की पढ़ाई से दूर होता चला गया। हालांकि दाखिला जरूर मेरा स्कूल में था। मैं क्लास अटेंड तो नहीं करता था पर हाजिरी कैसे लग जाती थी मुझे पता नहीं। परीक्षा दिया, बीच बीच में कई पेपर छोड़े भी फिर भी कैसे पास हो गया मुझे नहीं मालूम। यह बात बेहतर क्लास टीचर ही बता सकते हैं।

 यह कमबख्त सरकारी स्कूल की पढ़ाई भी अजीब सी होती थी। जिसे हिंदी अक्षर क से ज्ञ तक भी नहीं मालूम था वह भी राजधानी एक्सप्रेस की तरह नौवीं क्लास तक निर्बाध पास होता गया। ABCD आने और ना आने का तो सवाल ही नहीं उत्पन्न होता है।

सरकारी स्कूल के इसी पढ़ाई के लहर में मैं भी पास होता चला गया परंतु आंख तो तब खुली जब गर्मियों के स्कूल के छुट्टी के बाद पुनः स्कूल खुल गया और मैं नौवीं का एडमिशन लिया। सबसे पहला प्रॉब्लम विषय चुनने का था। कई दिन सोचता रहा साइंस ले लूं की आर्ट ले लूं।

 दरअसल साइंस से पढ़ता तो मैं कभी पास ना होता और आर्ट से पढ़ता तो इज्जत घट जाती। सभी छात्रों के बीच अब मैं धर्म संकट में था परंतु समाधान यह निकला कि साइंस पढ़कर फेल होने से अच्छा है आर्ट  पढ़ के पास हो जाओ और किसी तरह इज्जत बचा लो।

 सो यही किया मैंने। अंग्रेजी छोड़ा, गणित सरल था फिर भी मेरे लिए कठिन, विज्ञान छोड़ नहीं सकते थे। सच कहूं तो आर्ट पढ़ने से एक अंग्रेजी का ही भार उतर पाया बाकी का सब साइंस वाला ही था। परंतु अंग्रेजी की जगह संस्कृत आ गया जो उससे भी भारी थी पर नकल करने में अंग्रेजी की जगह संस्कृत ज्यादा आसान था मेरे लिए। खैर तमाम संभावनाओं को तलाशते तलाशते मैंने आर्ट साइड से पढ़ने का फैसला कर लिया।

आगे जब कक्षाएं चलने लगी तब मेरे लिए और समस्याएं बढ़ गयी। दरअसल मेरे साथ में पढ़ने वाले बच्चे केवल पास होने के लिए भी दाखिला लिए हुए थे अन्यथा सबको शिक्षा से कुछ लेना-देना नहीं था। मुश्किल से सभी पहली और दूसरी घंटी कर लेते थे बाद में मैदान में क्रिकेट खेलते। मैं अकेला क्या करता ? मैं भी क्रिकेट खेलने चला जाता। तब  मैं पढ़ता नहीं था क्रिकेट खेलता था स्कूल के पढ़ाई के समय में।

 पर मेरा ध्यान हमेशा उन पर आता था जो बच्चे साइंस साइड से पढ़ते थे। तब मेरे साथ के कुछ गवार लड़के थे वह भी साइंस साइड से पढ़ते थे। दरअसल उन को मुलायम सरकार पर कुछ ज्यादा ही भरोसा था। भरोसा तो मुझे भी था पर मैं रिस्क नहीं ले सकता था।

 इस बीच मैं जब भी साइंस वालों लड़कों को देखता था तो वह वापस में बातें करते रहते थे, मैं डॉक्टरी की तैयारी करूंगा, मैं इंजीनियर बनूंगा, मैं आईएएस-आईपीएस, मिलिट्री और ना जाने क्या-क्या? ऐसे माहौल में मेरा कोई लक्ष्य नहीं था सिवाय हाईस्कूल पास करने के। तब मैं उनकी बातों को सुनकर मन ही मन स्वयं को छोटा समझने लगा।

 मैं सोचता था क्या मैं जीवन में इतना असफल हो जाऊंगा कि भविष्य में किसी मित्र से मिलने पर मुझे लज्जा होगी? ऐसा सोचकर मेरे हृदय में जो असहनीय पीड़ा उभरती थी उसे सहन करना बेहद कठिन था। तब मुझे स्वयं से ही घृणा होने लगी। पछताने लगा कि यदि मैं मन से पढ़ाई किया होता तो आज मैं भी साइंस पढ़ रहा होता, मेरे भी ऊंचे सपने होते, आज लज्जित होने की नौबत नहीं आती।

 फिर भी मैं कुछ कर सकने में असमर्थ था। क्योंकि जब मैं विद्या से कोसों दूर था तो साइंस से नाम लिखा लेने भर से क्या हो जाता? सो मैं मन मारकर जैसे तैसे पढ़ाई करता रहा बिना किसी बड़े ख्वाहिश के और बिना किसी लक्ष्य को चिन्हित किए बिना।

 हां मैं आपको बता देना चाहूंगा कि मैं 2 घंटी शुरू के रोज ही पढ़ाई करता था। जिसमें दूसरी तो कभी-कभी छूट भी जाती थी पर पहली कभी नहीं छूटती। वह पहली घंटी होती थी हिंदी की। सोचिए जहां सब बच्चे बड़े बड़े ख्वाब देख रहे थे अपने पढ़ाई के बूते पर, ऐसे में मैं और मेरे कुछ साथी सिर्फ हिंदी की घंटी ही पढ़ते थे और मुश्किल से एक और घंटी, नहीं तो क्रिकेट खेलने निकल जाते थे। ऐसे में कैसा होगा हमारा भविष्य आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं।

 परंतु  आप यकीन नहीं करेंगे नौवीं क्लास की उस एक हिंदी की घंटी ने मेरे जीवन को ही बदल दिया। वैसे हिंदी पढ़ने लिखने की सूची मेरे मन में पहले से ही थी। ना जाने क्यों मैं कभी कविता, कहानियां  या लेख पढ़ता था तो मेरे दिल को छू जाती थी। एक वाक्य में कहूं कि मैं जब भी हिंदी पढ़ता था तो शब्द-शब्द को महसूस करता था।मैं पहले ही बता चुका हूं कि मैं चाय और पान की दुकान पर अखबार रोज ही पड़ता था। फिर हिंदी भाषा के प्रति मन में प्रेम होना स्वभाविक है।

 लेकिन जब मैं हिंदी की क्लास रोजाना नौवीं क्लास में पढ़ने लगा वहीं से मस्तिष्क ने मोड़ लिया। गुरुजी जब किसी भी पाठ को पढ़ाना शुरू करते थे तब उसके लेखक के जीवन पर प्रकाश डालते थे। जो कि किताबों में ही साफ साफ शब्दों में लिखा होता था। मैं जब अनेक लेखकों की जीवनी पड़ी तो ज्ञात हुआ कि अधिकतर सारे महान लेखक शायद ही बहुत अधिक शिक्षा ग्रहण किए हुए थे। ऐसे में तो शिक्षा का प्रश्न ही नहीं उठता। मैंने तुलसी, सूर, कबीर, रहीम, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद जैसे लेखकों की जीवनी पड़ी। जिसमें प्रेमचंद से मैं बहुत ही प्रभावित हुआ। इसका कारण यह था कि उनकी लेखनी समझ जल्दी आती थी। यहां मैंने यह भी जाना कि तुलसी सूर्य कबीर रहीम किसी विश्वविद्यालय से पढ़ कर नहीं आए थे। फिर भी वे हिंदी साहित्य के लेखकों की श्रेणी में सबसे ऊपर थे। यहीं से मेरे अंदर ऊर्जा पैदा हुआ कि मैं भी इनके जैसा चाहूं तो बन सकता हूं। क्योंकि साहित्य एक ऐसा क्षेत्र है जहां शिक्षा नहीं बल्कि आप की संवेदना और विचार मायने रखते हैं। साथ-साथ मुझे यह भी अनुभव हुआ कि अगर मैं जीवन में एक बड़ा साहित्यकार बन जाऊं तो कहीं भी सर ऊंचा कर सकता हूं। फिर मुझे अपने उन मित्रों के सामने लज्जित नहीं होना पड़ेगा जो भविष्य में डॉक्टर इंजीनियर बनने के बाद मुझसे मिलेंगे। पता नहीं क्यों मुझे लगने लगा कि जो लोग साइंस पढ़ कर जो नहीं कर सकते उससे कहीं बहुत ज्यादा साहित्यकार बनने के बाद मेरा जलवा होगा।

 फिर क्या था साहित्य से प्रेम तो मुझे था ही। इस प्रेम को मैंने और बढ़ाया। सालों तक इस क्षेत्र में मेहनत करता रहा और अंततः मेहनत रंग लाई। मैं यह भी बता दूं कि जब मैंने ठान लिया कि मुझे साहित्यकार बनना है तब से मैंने हिंदी के अलावा सब तरह से पढ़ाई छोड़ दिए। स्कूल में दाखिला रहा, मुलायम सिंह की सरकार थी, होम सेंटर था, खूब नकल हुआ और मैं हाई स्कूल इंटर में पास हो गया।

 बाद में मैं एक साहित्यकार बनकर उभरा बिना ही स्कूल के पढ़ाई के जहां से मैं स्वयं को बेहद खुशनसीब समझता हूं कि भगवान ने मुझे इतना अच्छा लक्ष्य दिखाया। नहीं तो मैं आज भी स्वयं की नजर में गिरा ही होता।

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