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सियासत के बदलते रूप रंग में समाज का हर रुप बदल चुका है खैर सियासत के रंग रुप का तो कहिए मत

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सियासत के बदलते रूप रंग

 सियासत के बदलते रूप रंग में समाज का हर रुप बदल चुका है। खैर सियासत के रंग रुप का तो कहिए मत। सियासत तो सियासत है। थी भी और रहेगी भी। सियासत में कभी तब्दीली नहीं होने वाली। हां परंतु काल और समय के अनुसार सियासी मसले अलग अलग हो सकते हैं। किंतु सियासत की जो जड़ है, सियासत के मूल की जो संरचना है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होने वाला। सियासत लालच है, सियासत बुराई है, सियासत क्रूरता का नाम है, सियासत नफरत बांटती है, सियासत दिलों को तोड़ती है, सियासत दंगे कराती हैं, सियासत भेदभाव उत्पन्न करती है, दुनिया में अगर कहीं भी अशांति है तो उसका कारण केवल वह मात्र केवल सियासत ही है।
भाइयों सियासत ही सारे फसाद का जड़ है। यानी अगर इस दुनिया में सियासत नहीं होती तो दुनिया में कुछ बुरा ना होता, चारों तरफ शांति का बसेरा होता, चिड़ियों के गीत के साथ सवेरा होता और धरती से कोसों दूर अंधेरा होता।
 सियासत के बदलते रूप रंग में समाज का हर रुप बदल चुका है।  खैर सियासत भी कई तरह की होती है। आप सियासत को किसी एक प्रकार से व्यक्त नहीं कर सकते। परिवार के सदस्यों में परिवारिक सियासत होती है, जातियों में जातीय सियासत होती है, बाजारों में भी सियासत होती है, गांव में ग्रामीण स्तर की सियासत होती है, फिर तहसील, ब्लाक, जिला, मंडल, राज्य, राष्ट्रीय, फिर अंतर्राष्ट्रीय सियासत।
सियासत के बदलते रूप रंग में समाज का हर रुप बदल चुका है। जो गैर राजनीतिक समूह हैं उसमें भी कम सियासत नहीं है। डॉक्टर डाक्टरों के साथ सियासत कर रहे हैं, वकील वकीलों के साथ, व्यापारी व्यापारियों के साथ भी सियासत कर रहे हैं। कुल मिलाकर कहें तो नीचे से लेकर ऊपर तक समाज के जितने भी अंग है उसमें सियासत किसी न किसी रूप में है। आप इसे किसी भी हालात में नकार नहीं सकते और यही सियासत सारी समस्याओं का जड़ है। सियासत समाज के एक-एक स्तर को दीमक की तरह चाट रहा है और हम देख रहे हैं फिर भी अनभिज्ञ हैं।
 अगर राष्ट्रीय सत्ता की सियासत की बात करें तो कहिए ही मत। कोई हिंदुओं का मसीहा बना बैठा है तो कोई मुसलमानों का। कोई तो स्वयं को सेकुलर बताकर ऐसे अघाता है जैसे धर्मनिरपेक्षता उसका जुड़वा भाई हो वैसे वास्तविकता यह है कि कोई भी पूर्ण रूप से धर्मनिरपेक्ष नहीं होता। हां मगर कथित रूप से हम उसे धर्मनिरपेक्ष कह सकते हैं।
किंतु यह सभी प्रकार के सियासत वाले कभी भी देश का भला नहीं करते अपितु उल्लू सीधा करते हैं। चुनाव में अपना-अपना गणित लगाते हैं और जाति धर्म के नाम पर सोशल इंजीनियरिंग करते हैं। यही इनके जीत का आधार होता है और यही तक उनके कार्य करने का उद्देश्य भी होता है। यह ना सबके लिए कोई काम किए हैं और ना ही करेंगे। वादे खूब करेंगे शिक्षा, सड़क, बिजली, पानी की।
किंतु सियासत में भाग लेने वाले लोग भी कुछ कम नहीं है। प्रत्याशी अगर अपने जाति, धर्म का हो तो उसे ही वोट देंगे। चाहे वह कितना भी खराब क्यों ना हो? लोग जाति धर्म और समूह के नाम पर वोट देकर प्रत्याशी को जीताते हैं। किंतु प्रत्याशी जीतने के बाद पूछता भी नहीं पूरे 5 साल के लिए। दूज का चांद हो जाता है।
वह तब तक मुंह दिखाने नहीं आता जब तक कि अगले चुनाव की तारीख घोषित नहीं हो जाती। और लोग इसी बात से 5 साल खुश हो लेते हैं कि चलो नेता जैसा भी है किंतु अपने जाति धर्म का है। बात यहीं तक आकर रुके तो कुछ कहा जाए परंतु बात तो तब और बिगड़ जाती है जब गंदी सियासत का असर परिवार के प्रत्येक सदस्य पर दिखता है। बाप किसी और पार्टी का समर्थक तो मां किसी और पार्टी की। बेटे की भी अपनी एक अलग ही विचारधारा वाली पार्टी होती है।
यही है हमारे देश के सियासत का रंग रूप। सियासत के इस रंग रूप को देखकर तो दिल से यही आवाज आती है कि हे भगवान तू ही है मालिक इस देश का। अब इसकी रक्षा कर तू!

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