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सोचिए दोस्ती कितना पवित्र शब्द है। दोस्ती और लगाव की पवित्रता कितनी भी गंदगी में क्यों ना हो पर कभी मलीन नहीं होती

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 दोस्ती और लगाव
दोस्ती, स्नेह, लगाव जीवन में किसी न किसी से जरूर होता है। सच माने तो शायद ही कोई ऐसा मनुष्य होगा जो बिना किसी के दोस्ती और लगाव के जीवन गुजार दें। हर आदमी किसी ना किसी का दोस्त जरूर होता है।
दोस्ती और लगाव के बाद दोस्त से आदमी को ऐसा आत्मीय लगाव हो जाता है कि एक पल भी दोस्त से दूर रहना गवारा नहीं होता। आदमी दोस्त के लिए जीवन गुजार देना चाहता है। एक-एक पल उसी के लिए जीना चाहता है और उसी के लिए मर जाना भी चाहता है।
 ऐसा होता है दोस्ती और लगाव। दोस्ती दो दिलों का वह पावन रिश्ता है जिसके पवित्रता का कोई सानी नहीं। दोस्ती में आदमी पवित्र हो जाता है निश्छल और निस्वार्थ हो जाता है। दोस्ती वहां है जहां प्रेम है, वात्सल्य है, ममता है। दोस्ती अंतकरण को शुद्ध कर देता है। इसमें दुनिया की हर खूबसूरत चीज समाहित होती है।
इसमें  प्रकृति के मनोहरता है, फूलों की सुंदरता और महक है, चिड़ियों की चहचहाहट है। दोस्ती बड़ा ही मनभावन है। जिस प्रकार भंवरा फुलवारी में गुंजन करता हुआ सब का मन मोह लेता है उसी प्रकार दोस्ती आदमी के मन में खामोश गुनगुनाती है और मन को हर लेती है।
 आप दिन-रात अपने दोस्तों को सोचते हैं। उनका ख्याल रखते हैं। दुख सुख में काम आते हैं। उसका दर्द खुद सहन करना चाहते हैं। फिर सोचिए आपके दोस्ती का स्तर कितना ऊंचा है कितना मनोरम है। मैं तो कहता हूं जिस आदमी को जीवन में एक अच्छा दोस्त मिल जाए उसका जीवन स्वर्ग हो जाए। उसकी सारी बाधाएं दूर हो जाए।
आप सोचिए राम जी को हनुमान जी मिले तो कितनी बाधाएं दूर हुई। अशोक वाटिका को उजड़ा, मां सीता को अंगूठी दिया, राक्षसों का संहार किया, लंका को जलाया, समुद्र में पुल बनवाया, मूर्छित लक्ष्मण के लिए सूर्योदय से पहले संजीवनी बूटी लाया और जान बचाया। इतनी प्यारी होती है दोस्ती जो अपने जीवन को दांव पर लगाकर दोस्त की मदद करती है।
सुदामा और कृष्ण की दोस्ती की वह कथा याद कीजिए जब सुदामा दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए थे। तब जब वे कृष्ण के दरबार संकोच करते करते पहुंचे और द्वारपालों ने जब श्रीकृष्ण को यह सूचित किया कि आपसे आपका मित्र सुदामा मिलने आए हैं तो श्रीकृष्ण नंगे पांव दौड़े आए और गले से लगाया। इससे बड़ा दोस्ती का अनुपम उदाहरण कहां मिलेगा। इतनी सच्ची दोस्ती और लगाव का उदाहरण मुझे तो नहीं मालूम।
यह भी एक दोस्ती का मिसाल ही है कि दुर्योधन के अधर्मी होते हुए भी करण ने उसका साथ नहीं छोड़ा। उसने दुर्योधन के लिए अपने भाइयों तक से युद्ध किया। वह यह जानता था कि वह एक अधर्मी का साथ दे रहा है जिसका हार निश्चित है। तब भी वह उसकी ओर से लड़ता रहा। उसने अपनी दोस्ती की मर्यादा को रखने के लिए दुर्योधन जैसे पापी का साथ दिया और वीरगति को प्राप्त हुआ। विरले ही ऐसा उदाहरण मिलता है जिसने अपने दोस्त के लिए जान दिया हो।
तो सोचिए दोस्ती कितना पवित्र शब्द है। दोस्ती और लगाव की पवित्रता कितनी भी गंदगी में क्यों ना हो पर कभी मलीन नहीं होती। कर्ण जैसा दोस्त पापी के साथ दोस्ती निभा कर भी दोस्ती और लगाव को मलीन नहीं होने दिया। ऐसे में दिल से यह स्वर निकलता है। जुग-जुग जिंदा रहे दोस्ती। दोस्ती फूलती रहे फलती रहे सबके दिलों में। दुनिया जब तक रहे दोस्ती का वर्चस्व कायम रहे।

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