Home religion जब भी आदमी ईश्वर से परे इस संसार को ही अपना सब...

जब भी आदमी ईश्वर से परे इस संसार को ही अपना सब कुछ मान लेता है या कहें कि जब भी इंसान ईश्वर से परे इस संसार से प्रगाढ़ नाता जोड़ लेता है तो वह मोह माया के वशीभूत हो जाता है

0
SHARE

 

मोह माया

 

 

जीवन से पहले आदमी क्या था और जीवन के बाद आदमी क्या होगा और किस परिस्थिति में होगा यह कोई भी नहीं जानता।

हालांकि हर व्यक्ति यह कोशिश करता है कि वह जान सके कि जीवन से पहले क्या था और यह भी जान सके कि जीवन के बाद कहां कैसे और किस परिस्थिति में होगा ? पर कहां जान पाता है? कल्पनाओं की दुनिया में उड़ता हुआ जाने कैसे-कैसे ख्वाब देख लेता है पर वास्तविकता कभी भी नहीं जान पाता है आदमी ।
दरअसल यह कुदरत का करिश्मा ही है कि इंसान संसार का सबसे बुद्धिमान जीव होकर भी एक दायरे तक सीमित है। हालांकि उस दायरे के बाहर जाना मुमकिन है कि नहीं इस पर संशय है परंतु कुदरत से जरूर जुड़ा जा सकता है। खैर चलिए आज मेरे चर्चा का विषय यह नहीं है आज मेरी चर्चा का विषय है मोह माया। हां यह वही मोह माया है जिसके कारण हम इस संसार से जुड़े हुए हैं। जीवन जीते समय हम जिस दुनियादारी को जीते हैं वही मोह माया है।
  प्रत्येक आदमी का संपूर्ण जीवन मोह माया में फंसा हुआ है। यहां तक कि जो  आदमी यह कहता है कि उसे दुनियादारी से कोई मतलब नहीं है वह भी मोह माया में फंसा है।
 जवानी में बचपन की लालसा और बुढ़ापे में जवानी की ख्वाहिश, मां बाप भाई बहन पत्नी बेटा बेटी का रिश्ता। या फिर हम दुनिया में जो भी घटनाएं देखते हैं उससे प्रभावित होकर तरह-तरह की कल्पना ही करते हैं। कभी सोचा है आपने कि यह सब क्या है? भाई यही तो मोह माया है। संसार की बंधनों का झमेला ही मोह माया है।
 पृथ्वी के किसी भी मूर्त या अमूर्त वस्तुओं की संवेदना में बहने की क्रिया को मोह-माया कहते हैं। मां का तबीयत खराब हो जाए तो चिंतित हो जाना। पत्नी से दूर हो जाओ तो करार ना मिलना। पुत्र को रोते देखकर आंखों का विह्वल हो जाना। सबका सब मोह माया है।
 आदमी जब दुनिया में आता है तो खाली हाथ आता है। इसी धरती पर उसे माता-पिता की प्राप्ति होती है। भाई-बहन पत्नी-पुत्र रिश्तेदार सब का साथ मिलता है। इसी धरती पर वह असीमित संपत्ति इकट्ठा करता है। यानी आदमी के पास धरती पर जो कुछ होता है वह धरती पर आने के बाद ही मिलता है। कोई मनुष्य साथ कुछ भी लेकर नहीं आता। किंतु मनुष्य जब वृद्ध हो जाता है और उसे लगने लगता है कि वह इस दुनिया को छोड़कर चला जाएगा तब क्या होता है जरा सोचिए ?
तब यही होता है कि वह दुनिया को छोड़ना नहीं चाहता। जब जब वह सोचता है कि वह दुनिया छोड़ जाएगा उसके आंख भर आते हैं। वह जमीन जायदाद बेटा बेटी संगी-साथी को याद करके खूब बिलखता है। बस इंसान के जीवन में यही प्रक्रिया यही सांसारिक संवेदना मोह माया है।
 जब भी आदमी ईश्वर से परे इस संसार को ही अपना सब कुछ मान लेता है या कहें कि जब भी इंसान ईश्वर से परे इस संसार से प्रगाढ़ नाता जोड़ लेता है तो वह मोह माया के वशीभूत हो जाता है।
 मोह माया इतना बलवान होता है कि गृहस्थ जीवन जीने वालों को तो हर परिस्थिति में नहीं छोड़ता है। गृहस्थ आदमी सांसारिक जीवन जीता है। रिश्ते-नातों को महत्व देता है। ऐसे में उसके अंदर मोहमाया का होना स्वभाविक है। मोह माया को जीवन से अलग करना इतना आसान नहीं है। किंचित ही कुछ लोग मिलेंगे जो मोह और माया के जाल से मुक्त होंं।
 इससे दूर होने के लिए सांसारिक सुख का त्याग करना पड़ता है। वैराग्य जीवन को धारण करना पड़ता है। तब भी इससे मुक्ति मिल जाए, पूर्ण रूप से कहा नहीं जा सकता। दुनिया में बहुत से लोग हैं जो अपने सांसारिक जीवन को त्याग कर सन्यास धारण करते हैं। उनको बहुत सी कठिनाइयों से होकर गुजरना पड़ता है। ईश्वर में लीन होकर तपस्या करनी पड़ती है। तब भी जीवन लग जाता है मोह माया से मुक्त होकर ईश्वर से युक्त होने में। इसका अर्थ यह है कि मोह माया से परे होना आसान हरगिज नहीं है और इस संसार के सभी लोग बस कुछ महान महापुरुषों को छोड़कर मोह माया में बंधे हुए हैं।
  अच्छा तो एक तरह से देखा जाए तो मानव के लिए मोह माया से अलग होना भी संसार के संचालन के लिए सही नहीं है। इसी वजह से जब भगवान ने संसार का सबसे खूबसूरत जीव मनुष्य का निर्माण किया तो उसके भीतर मोहमाया भर दिया। यही तो वह चीज है जो संसार को एक दूसरे से जोड़ती है। जरा सोचिए यदि यह न होती तो क्या हम अपने माता-पिता भाई-बहन पत्नी बच्चों से हृदय से जुड़ पाते हैं ? बिना मोह माया के क्या हम फूल पत्ती खुशबू झरना पहाड़ धरती आसमान के सौंदर्य का आनंद ले पाते ? क्या हम चांद की खूबसूरती को देखकर प्रेम रस से भर पाते ? क्या हम किसी के दुख सुख में भावुक होते?  नहीं ना! इसीलिए ईश्वर ने हमारे भीतर मोहमाया भर दिया सृजन के समय कि हम एक दूसरे को समझें। हम संवेदनशील बन सके। ताकि मानव समाज इस मोह माया से उपजी संवेदना के आधार पर स्वयं को विकसित करता रहे और यह धरती फूलती खिलती रहे।
यह चर्चा बस इतना ही तक। अपितु इस विषय पर और बहुत कुछ कहा जा सकता है। मोह माया को और चर्चा के दायरे में लाने की आवश्यकता है। क्योंकि यह हमारे जीवन का अहम अदृश्य हिस्सा है। क्योंकि इस पर और लिखने पर लेख लंबा हो जाता इसलिए इसे यहीं पर स्थगित करते हैं। आगे समय मिला तो फिर चर्चा करेंगे। धन्यवाद!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here