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भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए किसान देवता की तरह है क्योंकि देश के किसान अन्नदाता है

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भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए किसान देवता की तरह है क्योंकि देश के किसान अन्नदाता है। पूरे साल धूप, ठंड, गर्मी, बरसात हर मौसम में वह जी तोड़ मेहनत करता है जिसके बदौलत पूरे देश को अनाज मिल पाता है।
आज भारत ने कृषि उत्पादों के क्षेत्र में अपना मुकाम बनाया है। यह हमारे देश के मेहनती किसानों के कारण ही संभव हो पाया है। आजादी के बाद से देश ने बहुत तरक्की की है। ऐसे में जिस रफ्तार से विकास हुआ है उस विकास में किसानों के सहभागिता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
 आज भारत पूरे विश्व के खदान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन चुका है। देश गिने चुने मूल्को की  श्रेणी में खड़ा है जो खाद्य पदार्थ के उत्पादन में अग्रणी है। तो भारत यदि इस मुकाम तक पहुंच चुका है तो निश्चित तौर पर देश के कर्मठ किसानों को इसका श्रेय जाता है।
 मैं था तो नहीं पर सुना है जब लाल बहादुर शास्त्री जी देश के प्रधानमंत्री थे। तब देश में अनाज की भारी कमी हो गई थी, जनता दाने दाने के लिए मुहाल थी, तब अमेरिका दया स्वरूप गेहूं भेजता था। आज यदि आपको वह अमेरिका वाला गेहूं मिल जाए तो कभी नहीं खाएंगे, क्योंकि वह इतना खराब हो चुका होता था कि इंसानों के खाने के लिए उपयुक्त नहीं होता था। हां जानवर को जरूर डाल कर खिलाया जा सकता था।
 सोचिए हम उस समय इतना मजबूर थे कि अमेरिका से आए हुए सड़े-गले अनाज का सेवन करना पड़ा था। किंतु आज तो वैसा बिल्कुल ही नहीं है। आज हमें सड़े गेहूं चावल का सेवन नहीं करना पड़ता। आज तो जो शुद्ध अंदाज हम सब खाते हैं उसी को दल कर अपने पशुओं को भी खिलाते हैं। तो सोचिए हमारा देश किस तरह  अनाज उत्पादन के क्षेत्र में सीना ठोक कर मैदान में खड़ा है। यह सब देश के किसान की मेहनत का ही नतीजा है।
 अतः मैं तो यही कहूंगा कि शहरों में बैठे हुए औद्योगिक लोग भले ही इसका श्रेय किसानों को दें या नहीं दें। परंतु इतना तो ख्याल रखना ही चाहिए कि देश के किसान मजबूर ना हो, दर-दर की ठोकर ना खाए,  उसको मजलूमों जैसी जिंदगी जीना ना पड़े, उसे उसके फसल का सही मूल्य मिले, उसे आत्महत्या ना करनी पड़े, वह कर्ज में ना डूबे, सरकार उसकी अनदेखी ना करें।
क्योंकि देश के किसान ही इस देश को आगे ले आया है और आगे ले जाएगा। लाल बहादुर शास्त्री जी ने तो नारा भी दिया था जय जवान जय किसान। अटल बिहारी बाजपेई जी ने उसे और बड़ा किया जय जवान जय किसान और जय विज्ञान।
 तो सोचिए देश का किसान इतना बड़ा स्तंभ है तो उसकी अनदेखी क्यों कर भला किया जाए? यदि कहीं भी और किसी के भी द्वारा किसानों की अनदेखी की जाती है तो यह निश्चित ही बिना लाग-लपेट के निंदनीय है। इसकी भर्त्सना होनी चाहिए।
 आज आप अपने मुल्क पर नजर उठा कर देखिए तो कितना सक्षम है हमारा मुल्क। आज यदि देश में अकाल पड़ जाए तो भारत के पास इतना अनाज का भंडार है कि किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। आज तो विदेशों में अनाज निर्यात कर के भी विदेशी मुद्रा अर्जित किया जा रहा है। जिसका किरदार भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण है। तो क्या भारत आज इतना निर्भर अपने आप हो गया है?
 जरा सोचिए तो 125 करोड़ के देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाने  के लिए देश के किसानों ने कितना परिश्रम किया होगा। किंतु आज भारतीय औद्योगिक समाज यह मानने को तैयार ही  नहीं है कि किसानों का भारत जैसे जरई  मुल्क में अहम रोल है।
  बुरा तो तब लगता है जब देश के किसान की अनदेखी सरकार के द्वारा ही की जाने लगती है। जय जवान जय किसान में मात्र किसान दिखता है। किंतु सरकारी ढांचे में किसान विलुप्त हो चुका है। फिर भी सरकार को किसानों की चिंता नहीं है।
 
 किसानों के इस अनदेखी के लिए कोई एक राजनीतिक पार्टी जिम्मेदार नहीं है। सबने सरकार में रहते हुए किसानों के साथ अन्याय किया है। यह हो सकता है कि किसी ने ज्यादा किया है तो किसी ने कम किया है। परंतु दोषी सब हैं। क्षेत्रीय हितों को ध्यान में रखने वाली पार्टियां क्या किसानों के हित का ध्यान रख पाई? मैं तो नहीं समझता कि रखा है अन्यथा किसानों की यह हालत ना होती।
 देश की दो बड़ी पार्टियों में से एक पार्टी BJP भी 10 साल से ज्यादा सरकार में रह चुकी है। इस अवधि में किसानों के लिए एक अच्छी योजना लाकर उसके हालात में परिवर्तन लाया जा सकता था। किंतु स्वयं को राष्ट्रवादी कहने वाली यह पार्टी भी अब तक निकम्मी ही साबित हुई है। हालांकि अभी भी BJP की ही सरकार है सत्ता में तो मैं आग्रह करूंगा कि किसानों के लिए जल्द से जल्द कोई योजना लाकर उनके हालात में परिवर्तन लाया जाए।
 अब बात करते हैं कांग्रेस पार्टी की जो देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी दी है। कांग्रेस पार्टी आजादी के पहले की  पार्टी है और स्वतंत्रता आंदोलन में भी इसकी बड़ी भूमिका रही है। गांधी, सरदार, नेहरू, बाबा अंबेडकर, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसे दिग्गज इस पार्टी में अपना योगदान दे चुके हैं। परंतु दुख की बात यह है कि अब कभी आभास ही नहीं होता कि कांग्रेस पार्टी वही पार्टी है जिसमें इतने बड़े बड़े महापुरुष योगदान दे चुके हैं।
क्योंकि आजादी के बाद देश में यदि वास्तव में किसी पार्टी ने राज किया है तो वह है कांग्रेस पार्टी। अब तक इस पार्टी ने लगभग छह दशक तक राज किया है। ऐसे में जिस पार्टी ने इतनी बड़ी सफर तय की हो सरकार में उससे सवाल पूछना तो जरूरी बनता है। मैं तो पूछूंगा कि अगर वाकई में कांग्रेस पार्टी ने 6 दशकों तक देश हित में काम किया है तो किसानों की यह हालत क्यों है? क्यों किसान दर-दर की ठोकरें खा रहा है? यदि आप सब ने अच्छा काम किया होता तो आज किसानों की यह दयनीय हालत नहीं होती। आज किसान सुखी होता, समृद्ध होता, उसके चेहरे पर खुशहाली होती। किंतु ऐसा नहीं हो सका है तो इसमें दोष आपका भी हैं और आपका गलती सबसे ज्यादा है। क्योंकि आप ही ने इस देश में सबसे ज्यादा सत्ता का भोग किया  है।
  खैर यह तो मानना ही पड़ेगा कि देश के सभी पार्टियों की सरकार यानी कि भारत सरकार ने कभी किसानों के हित का काम नहीं किया और ना ही देश के किसान के हित का सोचा। किसान परेशान होता रहता है पर कोई उसकी सुध नहीं लेता। गेहूं की फसल आग में जल जाती है, धान बाढ़ में डूब जाता है तो कभी-कभी कई साल लगातार सूखा ही पड़ जाता है। ऐसे में किसान के लिए आमदनी तो दूर की कौड़ी है। खाने भर का अनाज भी नहीं मिल पाता। तब वह भूखा मरने लगता है, बच्चे कुपोषण के शिकार होने लगते हैं, गरीबी इतनी की कर्ज का सहारा लेना पड़ता है। पर आमदनी नहीं होती तो कर्ज़ भी नहीं भर पाते हैं हमारे किसान।
 ऐसे में उनके पास कोई रास्ता नहीं बचता तो आत्महत्या कर लेते हैं। तो यह आत्महत्या का जिम्मेदार कौन है? किसान तो नहीं है। लाजिम है सरकार ही होगी जिम्मेदार? क्योंकि किसानों के लगातार मुसीबत को देखते हुए भी सरकार अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी है जिससे उनके आत्महत्या को रोका जा सके। पूरे भारतवर्ष में हर साल हजारों की संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं।
 आखिर इन किसानों का कसूर क्या है? जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी यदि किसानों को आत्महत्या करनी पड़े तो यह देश के लिए शर्म की बात है। क्या हुआ जब केजरीवाल के सभा में दिल्ली के मैदान में जब किसान ने पेड़ पर फांसी लगा ली? वह मरता रहा भाषण चलता रहा। उसके मरने के बाद देश में जो राजनीति हुआ वह सबने देखा। सब नेता मिलकर एक दूसरे पर उसके आत्महत्या का ठीकरा फोड़ रहे थे। तब मीडिया में हो हल्ला के बाद थोड़ी आश जगी थी कि शायद अब हमारे देश की नेताओं की आंखें खुलेगी परंतु नहीं खुली।
 हम सोचते रहे कि यह आत्महत्या शायद किसानों की अंतिम आत्महत्या होगी परंतु नहीं। किसानों की आत्महत्याएं दिन-ब-दिन होती जा रही है। कुछ नहीं हो रहा उनके लिए। सरकार मौन है, विपक्ष मौन है, पूरा देश  चुपचाप है, देश के किसान की पीड़ा की चीत्कार किसी सिंहासन तक तो पहुंच रही है किंतु सिंहासन खामोश है, मूकदर्शक है, निर्दयता से सब देख रहा है।
 अब यदि भारत सरकार कितने भी दावे करें कि उसने किसानों के लिए हितकारी कदम उठाए हैं परंतु मैं नहीं मानता। क्यों मानूं मैं? अंधा नहीं सब देख रहा हूं। यदि किसानों के लिए हितकारी कदम उठाए गए होते तो तमिलनाडु से दिल्ली जाकर किसानों को रामलीला मैदान में धरना नहीं देना पड़ता। पहले भूख हड़ताल फिर नर मुंडो की माला पहनना फिर चूहे खाना फिर पेशाब पीना क्या-क्या नहीं किया अपने मार्मिक पीड़ा को सरकार तक पहुंचाने के लिए किसानों ने ?
 मैं कहता हूं दुनिया को अनाज खिलाने वाले को चूहा क्यों खाना पड़े ? धरती माता को सिंचाई कर पानी पिलाने वाले को पेशाब क्यों पीना पड़े ? अगर ऐसा होता है तो यह देश और सरकार की नाकामी है। ऐसा हरगिज़ नहीं होना चाहिए। किसान के एक-एक चीख का उत्तरदायित्व सरकार का है। सरकार को चाहिए कि कोई अच्छी योजना को  लाकर देश के किसान की समस्याओं का निदान करें।
 किसानों के आह पर हमारे देश के शीर्ष सिंहासन पर बैठे लोगों का व्यथित होना दायित्व है। मैं चाहता हूं कि इस दायित्व का निर्वहन तन मन धन से हो और किसानों के चेहरे पर मुस्कान लाया जाए।

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