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अधिक बोलना किसी भी परिस्थिति में सही नहीं माना जा सकता । अधिक सोचना चाहिए, अधिक करना चाहिए, पर अधिक कभी नहीं बोलना चाहिए।

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अधिक बोलना किसी भी परिस्थिति में सही नहीं

 

 

 

अधिक बोलना किसी भी परिस्थिति में सही नहीं माना जा सकता । अधिक सोचना चाहिए, अधिक करना चाहिए, पर अधिक कभी नहीं बोलना चाहिए।

 

 

 

 

अधिक बोलना किसी भी परिस्थिति में सही नहीं माना जा सकता । अधिक सोचना चाहिए, अधिक करना चाहिए, पर अधिक कभी नहीं बोलना चाहिए। अधिक बोलने की आदत कब आपकी रुसवाई का कारण बन जाए यह कोई नहीं जानता। वैसे भी जो लोग अधिक सोचते हैं और जो अधिक करने का तलब रखते हैं वह कभी भी अधिक नहीं बोलते क्योंकि वह अधिक सोचने के कारण समझदार होते हैं और अधिक कार्य करने के कारण उनके पास समय का अभाव रहता है।

 यही कारण है कि ज्यादा सोचने व कार्य करने वाला व्यक्ति कभी अधिक बोलता ही नहीं है। परंतु इसके विपरीत देखा जाए तो जो व्यक्ति बहुत ज्यादा बोलता है वह सोच-विचार कम करता है वह अपने कार्य में भी ध्यान कम देता है। ऐसे लोग बोलते तो अधिक हैं पर सोचते कम हैं। ज्यादा  बोलने वालों की बातें अक्सर ही इस स्तर की होती है जिन पर कोई भी ध्यान नहीं देता।
अधिक बोलना किसी भी परिस्थिति में सही नहीं माना जा सकता ।
 क्योंकि ऐसे लोग अर्थपूर्ण और तर्कसंगत बातें नहीं करते हैं और बिना वाणी पर विराम लगाएं ही जो मर्जी वह बोलते जाते हैं। इस कारण ऐसे आदमी की कदर समाज में गिर जाती है और सब की नजर में मजाक का पात्र बन जाता है।
 यदि आदमी शिक्षित हो विद्वान हो और तर्कसंगत बोलने में माहिर हो तो भी उसे कम ही बोलना चाहिए। क्योंकि बुद्धिजीवियों के लिए ज्यादा बोलने की आदत और भी घातक सिद्ध होती है। सोच कर देखिए अगर आप बुद्धिजीवी हैं इस नाते निर्बाध रुप से बेलगाम आप किसी विषय पर विचार व्यक्त करने लगे तो क्या होगा ?
अधिक बोलना किसी भी परिस्थिति में सही नहीं माना जा सकता ।
मेरा तो मानना है कि अधिक बोलने से गलत बोलने की संभावना ज्यादा रहती है । क्योंकि आदमी जब अनवरत बोलता है तो बोलते बोलते हो सकता है कि वह मस्तिष्क और मुंह का संतुलन कुछ क्षण के लिए ही सही पर खो बैठे।
ऐसे समय में मुंह से निकलने वाले वाक्यों में हो सकता है कि कुछ वाक्य आपके विचारों से विपरीत निकल जाए। फिर क्या होगा आपका सोच कर देखिए ? आप उपहास के पात्र बन जाओगे। हो सकता है आप अपने प्रशंसकों को संतुष्ट ना कर पाओ और उनके नाराजगी का शिकार बन जाओ। हो सकता है किसी के प्रति अपशब्द निकल जाए और आपको बड़े स्तर पर विरोध का सामना करना पड़े। हो सकता है आपको अपनी टिप्पणी के लिए खेद व्यक्त करना पड़े या माफी मांगने पड़े।
यानी कि आपकी ज्यादा और बिन सोचे समझे बोलने की प्रवृत्ति आपके लिए घातक सिद्ध हो सकती है। तो आज से ही ध्यान रखें कम बोले सही बोले सोच समझकर बोले। इससे आप किसी भी तरह की अतिरिक्त शर्मिंदगी और उपहास से स्वयं को बचा सकते हैं।
अधिक बोलना किसी भी परिस्थिति में सही नहीं
अधिक बोलना किसी भी परिस्थिति में सही नहीं माना जा सकता ।
अधिक बोल कर फंसने वालों का यदि आप उदाहरण देखना चाहोगे तो भी बहुत मिलेंगे। मैं तो बहुत अच्छे अच्छे लोगों को जानता हूं जो समाज में बड़े ही सम्मानित होते हैं किंतु अपनी वाणी पर कंट्रोल नहीं रख पाने के कारण अपमानित हो जाते हैं। आप भी ऐसे लोगों से भली भांति परिचित होंगे। खैर मैं ऐसे लोगों के नामों का तो वर्णन नहीं कर सकता पर इतना जरूर बताऊंगा कि किस किस स्तर के लोग अनजाने में ऐसे विवादों का शिकार हो जाते हैं। हालांकि मैं ऐसे लोगों को दोषी नहीं मानता क्योंकि इनसे सच और सही बोलते बोलते ही कुछ वाक्य गलत निकल जाते हैं। कभी-कभी तो सही बातों को भी तोड़ मरोड़ कर समाज में गलत साबित कर दिया जाता है और विरोध किया जाता है।
परंतु फिर भी मैं यही मानता हूं कि बोलने वाले को संयमित होना चाहिए और कुछ भी बोलते समय सौ बार सोच लेना चाहिए कि उसके वाक्यों का सही के साथ साथ कुछ गलत अर्थ भी तो नहीं निकल रहा है। क्योंकि वह अपने वक्तव्य के सही अर्थों का श्रेय लेने का हकदार है तो गलत अर्थों के लिए भी जिम्मेदार वही होगा।
अधिक बोलना किसी भी परिस्थिति में सही नहीं माना जा सकता ।
 यह जो अधिक बोलने की आदत जिसके भी पास है वह ऐसी भूल कर ही देता है। आप किसी नेता को ही देख लीजिए बेचारे नेता भी एक अलग ही किस्म के प्राणी होते हैं। इनको हर  विषय पर अपना राय रखना जरूरी लगता है। अपितु इसके पीछे यह बात नहीं है कि नेता बहुत ज्ञानी होता है। नेता तो मीडिया में बने रहने के लिए राय रखते हैं। कहीं ना कहीं अपने कद को ऊंचा करने की मंशा भी इसमें शामिल है।
 परंतु वास्तव में होता क्या है? बोलते-बोलते गलतियां हो जाती हैं जिससे पूरे देश में एक्सपोज होना पड़ता है और पब्लिसिटी की इच्छा भारी पड़ जाती है।
 आजकल ज्वलंत विषयों पर कलाकार भी अपने विचार रखने लगे हैं। मैं यह नहीं कहता कि उनका विचार रखना गलत है परंतु इतना तो जरूर कहूंगा कि उनका यह हर विषय पर ओपिनियन देना घातक सिद्ध हो रहा है। दरअसल जब भी कोई सेलिब्रिटी अपना विचार व्यक्त करता है तो उसे राजनीतिक रंग दे दिया जाता है। जिसके कारण उसके   फैन ही दो धड़ों में बट जाते हैं और जहां एक तरफ वाहवाही होती है तो दूसरी तरफ किरकिरी।
 यह कहीं ना कहीं अधिक बोलने की वजह से ही इतनी बड़ी बखेड़ा खड़ी होती है। इसलिए मैं तो कहूंगा कि किसी भी कलाकार को अपने कला पर गौर करना चाहिए न कि ज्यादा बोलकर कंट्रोवर्सी खड़ी करनी चाहिए।
ऐसे ही कोई लेखक कोई हास्य कवि कोई व्यक्ति अधिक बोलने की वजह से गलती कर बैठता है और कंट्रोवर्सी का शिकार हो जाता है। सो मैं तो यही कहूंगा कम बोलिए सोच समझ कर बोलिए सबके हित की बोलिए और सत्य बोलिए। जय हिंद!
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