काश ऐसा होता यह वाक्य प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में दोहराता रहता है

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काश ऐसा होता

 काश ऐसा होता यह वाक्य प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में दोहराता रहता है। आप अगर ध्यान देकर सोचें तो आपको पता चलेगा कि आप भी जाने अनजाने में इस शब्द का अपने दिनचर्या में प्रयोग करते ही रहते हैं।
दरअसल आदमी की ख्वाहिश ना अब तक पूरी हो सकी है और ना ही कभी पूरी होने वाली है। आदमी अपने जीवन में अनेकों ख्वाब देखता है और उसे पूरा करना चाहता है। हालाकी आदमी का ख्वाब तो उसके मेहनत और लगन से 1 दिन पूरा हो ही जाता है परंतु इच्छाओं का जो सिलसिला है वह कभी नहीं रुकता।
 आदमी अपने जीवन में जब भी एक मंजिल को प्राप्त कर लेता है तो उसकी इच्छाएं उसे दूसरे मंजिल की तरफ अग्रसर कर देती है। अतः वह पुनः अपने मेहनत द्वारा पाए गए मंजिल पर रुक कर उसका आनंद नहीं देता बल्कि वह उससे भी बड़ा कोई टारगेट बनाकर उसके पीछे लगातार भागने लगता है।
  अर्थात आदमी जब तक जीवित है वह चैन से नहीं बैठ सकता। उसे निरंतर कुछ न कुछ पाने की इच्छा दिल में बनी रहती है। मनुष्य के इस चाहत को हम लोभ की संज्ञा दे सकते हैं।
 इसमें कोई दो राय नहीं है अगर हम इसे परिभाषित करें तो हम कह सकते हैं कि मनुष्य की इच्छाएं चाहे कितनी ही बार पूरी हो जाए परंतु वह मरती नहीं है। यहां यह कहना यह उचित होगा कि आदमी की इच्छाएं जितनी पूर्ण होती है उतनी ही बढ़ती जाती है। नए-नए इच्छाओं का मन में आगमन हो जाता है।
 दरअसल इन इच्छाओं का निरंतर बढ़ते जाना ही काश को जन्म देता है। जब आदमी के भीतर इच्छाएं बढ़ जाती है तो आदमी सोचने लगता है कि काश ऐसा होता।
काश ऐसा होता, काश यह मिल जाता, काश वह मिल जाता, काश हम यह कर लेते, काश हम वह कर लेते हैं। कुल मिलाकर आदमी को जो भी मिला है वह उसमें संतुष्ट नहीं होता है। खुश होकर उसका उपभोग नहीं करता है। अपितु काश ऐसा होता के चक्कर में हमेशा ही बेचैन रहता है।
अगर वह  उस काश को पा भी लेता है तो एक नया काश जन्म ले लेता है और आदमी नए काश के पीछे निरंतर भागने लगता है। जरा सोचिए इस काश के चक्कर में सबने अपना कितना बहुमूल्य सुखी समय को खराब किया है।
 आप सोच कर देखिए दुनिया का हर व्यक्ति इस काश ऐसा होता के चक्कर में व्यस्त है और जो नहीं व्यस्त हैं वह भी इस काश के वजह से भी। आदमी जब भी कुछ नया देखता है या महसूस करता है वह काश के चक्कर में फस ही जाता है।
  कोई जब भी कोई फिल्म देखता है तो सोचता है काश इस फिल्म का हीरो मैं ही होता। कोई प्लेन की यात्रा करता है तो सोचता है काश मैं पायलट होता और कॉकपिट में बैठकर बादलों का अपनी आंखों से दीदार करता। कोई गरीब है तो सोचता है काश मैं अमीर होता। अमीर हो जाए तो सोचता है देश का सबसे बड़ा अमीर होता। देश का सबसे बड़ा अमीर हो जाए तो दुनिया का सबसे बड़ा अमीर होता काश। और पूरी दुनिया मुट्ठी में आ जाए तो भगवान बन जाता काश। यानी कि आदमी का जात इतना लालची है कि सदा काश काश का राग अलापना रहता है और इसी काश के चक्कर में उसका सारा सपना ही अधूरा रह जाता है और अंततः एक दिन वह दुनिया से चला जाता है।
 वह स्वयं खत्म हो जाता है लेकिन यह काश ऐसा होता वाली जो लाइलाज बीमारी है ना यह कभी खत्म नहीं होती। साफ साफ शब्दों में कहें तो यह काश वाली बीमारी मृत्यु के साथ ही जाती है 4 आदमियों के कंधे पर।
  आप सोचें तो सही जब हम बच्चे थे। धुंधला धुंधला याद है तब हम सोचते थे हम चलने लगेंं, चलने लगे तो दौड़ने की सोच आई, फिर साइकिल चलाने की फिर मोटरसाइकिल चलाने की फिर मोटर कार कैसे-कैसे हमारी इच्छा काश के चक्कर में बढ़ती गई। पर यह काश गई नहीं है जिंदगी से। यह  अगर आख़िरी काश पूरी भी हो जाती है तो एक नई आख़िरी काश उत्पन्न हो जाएगी। अगर नही भी पूरी हुई तो काश काश  ही रह जाएगी।
 आदमी बचपन में सोचता है काश जवानी आ जाए। जवानी में नाती-पोतों की प्राप्ति की इच्छा जागती है और जब बुढ़ापे में मरने लगता है तो धुंधली धुंधली आंखों से दुनिया को देखता हुआ थका-थका बोलता है कि काश मेरा बचपन वापस बुला मिल जाए। मैं इस दुनिया में पहले की तरह खेलूं कूदूं ,घूमू फिरूँ, शरारते करूं, काश मैं मरूं नहीं काश कि मैं हमेशा जीवित रहूं। मतलब अंतिम समय तक यह काश पीछा नहीं छोड़ता सांस भले पीछा छोड़ दे।