कुछ ऐसा था टेलीविजन का शुरुआती जमाना, आप भी जानें

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कुछ ऐसा था टेलीविजन का शुरुआती जमाना, आप भी जानें

टेलीविजन का शुरुआती जमाना
जब मैं छोटा था तब टेलीविजन गांव के लिए दुर्लभ वस्तु थी । सैकड़ों घरों में किसी एक घर में टेलीविजन होता था। बात यह है कि उस समय टेलीविजन तो था पर टेलीविजन की क्रांति नहीं आई थी। गांव में आज की तरह तब जिसके भी घर यह सुविधा होती थी वह ऐसे भाव खाता था जैसे आज के जमाने में करोड़ों की गाड़ी रखने वाला करोड़पति भी नहीं खाता है।

कुछ ऐसा था टेलीविजन का शुरुआती जमाना

 खैर कोई बात नहीं! वह समय ही अभाव का था, ऐसे में जिसके भी पास ऐसी कोई चीज होगी जो दूसरों के पास उपलब्ध ना हो तो लाजमी भाव खाएगा। तब टीवी देखने की अजीबोगरीब लत लग गई थी बच्चों में। जिस में मैं भी शामिल था। टेलीविजन का शुरुआती जमाना मुझे अच्छी तरह याद है कि उस समय जिस के घर भी टीवी था उसके घर धारावाहिक आने से पहले ही मेला लग जाता था। हालांकि लाइट कभी रहती थी कभी नहीं रहती थी पर उस समय जब तक लाइट रहे तब तक तो धारावाहिक देखते ही थे । परंतु यदि बीच में लाइट चली जाए तो लाइट आने का तब तक इंतजार करते थे जब तक की धारावाहिक का समय निकल ना जाए। वह भी क्या दिन थे याद करने पर अपने आप पर एक उदासी सी मुस्कुराहट होंठों पर  तो खिल ही जाती है।

कुछ ऐसा था टेलीविजन का शुरुआती जमाना

 मैंने अभाव की जिंदगी बड़ा करीब से देखा है। घर पर टेलीविजन ना होने के कारण किस तरह दूसरों के दरवाजे पर दस्तक देते थे मुझे पता है? टेलीविजन का शुरुआती जमाना कमरे में जगह ना होने के कारण भगा दिए जाते थे। मेरे जीवन के वो दिन इतने अजीब थे की धारावाहिक और फिल्म भोजन को भी भूल जाने पर मजबूर कर देते थे। कृष्णा, शक्तिमान, अलिफ लैला जैसे धारावाहिकों को देखने के लिए पूरे दिन इंतजार करते थे। यह जानते हुए कि उस दिन बिजली रहेगी कि नहीं इसका कोई भरोसा नहीं ।

कुछ ऐसा था टेलीविजन का शुरुआती जमाना

टेलीविजन का शुरुआती जमाना
 फिल्मों का भी कम इंतजार नहीं रहता था। मतलब कल हम जितना टीवी के पीछे पागल थे उतना आज कोई लड़का गर्लफ्रेंड के पीछे पागल नहीं होता। कई बार तो अंटीना घुमा कर टावर पकड़ाने में ही धारावाहिक का समय निकल जाता था। तब मन में निराशा तो ऐसी होती थी जैसी परीक्षा में फेल होने पर नहीं होती। टेलीविजन का शुरुआती जमाना कुछ इस तरह था टेलीविजन के क्रांति के पहले का शुरुआती समय।

कुछ ऐसा था टेलीविजन का शुरुआती जमाना

 मुझे अभी अच्छी तरह याद है शाम को पढ़ते तो नहीं थे रेडियो पर गाना जरुर सुनते थे । टेलीविजन का शुरुआती जमाना रात तक तब अचानक 10:00 बजे के करीब लाईट आ जाती थी। टीवी का ख्याल लेकर तब बड़ा ही प्रेम से माता पिता से अनुमति मांगते थे। एकदम वैसे ही जैसे सिफारिश के लिए दरोगा के पास गया हुआ आदमी विनम्रता दिखाता है। काफी नाकुर निकुर के बाद अनुमति मिल पाती थी तब। कभी कभी तो अनुमति नहीं भी मिलती थी । तब माता पिता के आंख से बच कर भाग जाते थे। ऐसे में जब उनको पता चलता था तो उसी रात को पकड़कर लाते थे। तब सीरियल ना देखने का मन में कितना दुख होता था हम कह नहीं सकते और अनुभव आज भी करते हैं उस समय का ।

कुछ ऐसा था टेलीविजन का शुरुआती जमाना

कई बार तो लाइट के आने से पहले ही नींद आ जाती थी और जब बीच में नींद खुलती तो दौड़े हुए जाते थे और यदि धारावाहिक का समय खत्म हो गया होता था तो पछतावा के मारे बेहाल हो जाते थे।
 उस समय शादियों में भी टीवी बीसीआर का प्रचलन ज्यादा था। आज के समय में आर्केस्ट्रा डीजे का प्रचलन है पहले तो पूरी रात टीवी और बीसीआर चलता था । टेलीविजन का शुरुआती जमाना उस समय गांव के लोग फिल्म देखने तो जाते ही थे पर दूसरे गांव के लोगों भी आ जाते थे। इतनी उत्सुकता थी आदमी के भीतर टीवी का। अच्छा तो एक बात और करने के लायक है कि उस समय लाउडस्पीकर की आवाज इतनी तेज रखी जाती थी कि आजू बाजू के 10 गांव के लोग भी जान जाते थे की फिल्म कहां चल रहा है । इससे उनको पता नहीं ढूंढना पड़ता था। तब मैं भी किसी ना किसी जुगत से दर्शकों की भीड़ का हिस्सा बन ही जाता था। मतलब टीवी के प्रति वह दीवानगी अविस्मरणीय है।
कुछ ऐसा था टेलीविजन का शुरुआती जमाना
 आज जब भी घर में रिमोट लेकर टीवी के सामने बैठता हूं तो वह दिन याद आ जाते हैं। आज जब इंटरनेट के माध्यम से लैपटॉप पर फिल्म देखता हूं तो अभाव के दिन याद आते हैं । टेलीविजन का शुरुआती जमाना सोचता हूं कितना बदल गई है यह दुनिया। टीवी की ऐसी क्रांति आई कि टीवी घर घर में हो गया। पर यही टीवी कल दूसरों के दरवाजे तक खींच ले जाती थी  अनायास ही।

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