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आतंकवाद और धर्म का सम्बन्ध क्या है आईए जानते हैं

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आतंकवाद और धर्म का सम्बन्ध क्या है


आतंकवाद और धर्म

आतंकवाद और धर्म का सम्बन्ध

दोस्तों कैसे हो आप सब, आशा करता हूँ की आप सब सकुशल होंगे।

सबसे पहले तो आपका आज के हामारे इस नए लेख पर हम तहे दिल स्वागत करते है। दोस्तों आजके हामारे इस नए लेख का मुख्य विषयवस्तु आतंकवाद और धर्म का सम्बन्ध है।

यहाँ हम जानने की कोशिश करेंगे की आतंकवाद औरधर्म के बीच में क्या कुछ सम्बन्ध है या फिर ये केवल एक अफवाह है।

तो चलिए सबसे पहले ये दो भिन्न संकल्पनाएँ क्या  क्या  प्रकाशित करती है उसी को जानने की कोशिश  करते है।

आतंकवाद और धर्म

धर्म क्या है ?

मानव सभ्यता के आरम्भ में मानव केवल प्राकृतिक नियम अनुसार ही परिचालित होते थे। उस समय इंसान ये समझने में शक्षम नहीं थे की प्राकृतिक घटनाये क्योंहोती है, कैसे होती है ?

वैज्ञानिक ज्ञान के आभाव के कारण इन सभी (धूप, बारिश , भूकंप, बाढ़) को उस समय के मानव, कोई अतिमानवीय शक्ति का प्रभाव समझते थे। समय बीतने के साथ साथ उन अतिमानवीय शक्तिओ को संतुष्ट करने के लिए ये लोग पूजा पाठ भी करने लगे थे।

दुनिया के कुछ महान महान समाजशास्त्रीयो के अनुसार यही पर मानव समाज में धर्म का जनम होताहै।

दोस्तों अब शायद आप समझ सुके होंगे की मानव समाज में धर्म के जनम का जो मुख्य कारण था, वो था मानव की सुरक्षा।

अब शायद आपके मनमे फिरसे प्रश्न उठ सकता है, की कैसे ?

सबसे पहले तो आदिम मानव समझने लगे थे की अतिमानवीय शक्ति उनके लिए हानिकारक हो सकते है(अगर वे उनके ऊपर रुस्त हो गए तो), इसीलिए वे  उन शक्तिओ को संतुस्ट करने के लिए पूजा पाठ करने लगेथे।

पूजा-
पाठ क्यों करने लगे थे ? 

ऐसा इसलिए करने लगे ताकि अतिमानवीय शक्ति उनके ऊपर रुष्ट ना हो जाये। और उन शक्तिओ को रुष्ट क्यों नहीं करना चाहते थे ? ताकि अपने और अपनों की हानि ना हो। अर्थात इस पुरे कार्यो का जो एक मुख्य अर्थ है वो है की किसी का अपकार ना होऔर सबका उपकार हो।

अर्थात धर्म का जनम ही समाज की कल्याण के लिए हुआ है (हालाकि आदिम मानव की धारणा उस समयसही नहीं थी, क्योकि वे यौक्तिक रूप से सोच नहीं पाते थे).

समय बीतता गया और मानव समाज ज्यादा जटिल होती गयी। लोगो की मानसिकता अब यौक्तिकता की ओर गति करने लगी।

मानव अतिभौतिक स्तर से आकर अब प्रत्यक्षवादी स्तर में पहुंच गए।

मानव समाज के विकास के इस प्रत्यक्षवादी स्तर में धर्म का अर्थ भी विवर्तित होने लगा।

 इस स्तर में धर्म का अर्थ पूजा-पाठ, बलि-बिधान से हटकर प्रेम, दया, करुणा,मानव प्रेम, मुक्ति, एकता, अहिंसा, सहिष्णुता की ओर अग्रसर होने लगे।

दोस्तों आप दुनिया के किसी भी धर्म को देख लो चाहेवो हिन्दू हो या फिर इस्लाम, सिख हो या फिर क्रिस्चियन, बुद्धिस्ट हो या फिर ईसाई, आपको इन  सभी में एक ही सारे आदर्श देखने मिलेंगे।

आदिम अवस्था से आज तक जितने धर्म विकशित   हुए है उन सभी का एक ही मुख्य लक्ष है, जो है  मानवकल्याण और मानव मुक्ति; चाहे वो यौक्तिक  तरीके से हो या फिर अयौक्तिक तरीके से हो।

यौक्तिक (आधुनिकतावाद के अनुसार): – प्रेम, दया,करुणा, सहिष्णुता, अहिंसा इत्यादि।

अयौक्तिक : – बलि-बिधान।

आतंकवाद और धर्म

आतंकवाद और धर्म

आतंकवाद क्या है ?

दोस्तों हम सभी मनुष्य की अपनी अपनी इच्छा होती है और उस इच्छा को पूर्ण करने के लिए हम मेहनत  करते है, कार्य करते है ; लेकिन बहुत समय पर ऐसा होता है की हमारा वो कार्य या मेहनत हमें फल देने में अशक्षम हो जाते है और अंत में हमको प्राप्त होता है विफलता ।

यहाँ पढें धर्म के सम्बन्ध में =  धार्मिक निबंध 

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