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धर्म के प्रति मेरा अपना स्वतंत्र दृष्टिकोण

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धर्म के प्रति मेरा अपना स्वतंत्र दृष्टिकोण

हालांकि मैं धार्मिक हूं भगवान को मानता हूं उन से प्रेम करता हूं और धार्मिक नियमों के पालन में सख्ती को स्वीकार करता हूं । करूं भी क्यों ना ? धर्म हमें संगठित रखता है । समाज के अनुरूप चलना सिखाता है । सत्य और असत्य में भेद बतलाता है । यदि हम में से कुछ लोग धर्म को ना माने भी तो भारत में धर्म का वर्चस्व सदा रहेगा । क्योंकि भारत देश की बुनियाद ही धर्म और अध्यात्म के ईटों को जोड़कर बनाया गया है। यानी धर्म के बिना तो भारत की कल्पना ही नहीं की जा सकती।

भारत एक धार्मिक देश था, है और रहेगा। भारतीय धार्मिक आधारशीला को तो चार्वाक जैसे नास्तिक ऋषि भी ना हिला सके तो किसी और की बिसात ही क्या है ? इसलिए मैं भी आस्था में विश्वास रखता हूं। नास्तिकता नकारात्मकता का प्रतीक है और नकारात्मकता का कभी ना कभी नाश होना ही है । फिर क्या फायदा नकारात्मक होने से ? इसलिए मैं पूर्ण रूप से आस्तिक हूं और अपने धर्म अपने भारतीय संस्कृति का पुरजोर समर्थक हूं । खैर इस सब के अलावा भी मेरा अपना दृष्टिकोण है।

  दोस्तों महाभारत का युद्ध जिस उद्देश्य से लड़ा गया था कभी कभी उस उद्देश्य से मुझे असंतुष्टि होती है। क्योंकि मैं जब भी भारत के हालात पर नजर डालता हूं तो देखता हूं कि अब तक कुछ खास तब्दीली नहीं आई है । वह समस्याएं जो तब थे आज भी किसी न किसी रूप में विराजमान है जिसके निदान के लिए महाभारत युद्ध लड़ा गया था ।

मैं पूछना चाहता हूं कि क्या स्त्रियों का अपमान रुका है ? क्या सूत पुत्रों को अधिकार मिल चुका है ? क्या भेदभाव खत्म हो गया है ? क्या अब मक्कारी नहीं है? क्या अब अधर्म  खत्म हो गया है ? दोस्तों गहन निरीक्षण करने के बाद पता चलता है कि आज भी सब कुछ उसी तरह है बस थोड़ा स्वरूप परिवर्तित हो गया है।

  मेरी नजर में महाभारत का युद्ध कभी भी धर्म अधर्म, सत्य असत्य , छली योद्धा,  दानव मानव, जय पराजय, राज्य सत्ता का युद्ध नहीं रहा । ना ही स्त्री का मान मर्दन इसका कारण रहा और ना ही स्त्री को न्याय तक ले जाने तक इसका अंत और ना ही युद्ध समाप्ति के बाद पूर्ण रूप से धर्म की स्थापना हो सकी । हालांकि बहुत लोग मुझसे  असहमत हो सकते हैं क्योंकि अत्यधिक धार्मिक आस्था रखने वाला व्यक्ति असत्य के साथ साथ सत्य को भी नकार देता है यदि बात उसके धर्म के विरुद्ध हो तो । क्योंकि  प्रेम धर्म से हो या स्त्री से या माता-पिता पुत्र मित्र पशु पक्षी वगैरह वगैरह से अंधा तो प्रत्येक परिस्थिति में बना ही देता है।

अपितु पहले से भयंकर परिस्थिति आज है । इतिहास उठाकर देख लीजिए महाभारत के बाद भारत में धर्म ने कितनी उन्नति की? स्त्रियों को कितना न्याय और अधिकार मिला ? रूढ़ियों अंधविश्वासों की क्या स्थिति रही ? भेदभाव छुआछूत ऊंच-नीच का क्या हाल रहा?  भारत और भारतीय संस्कृति संकुचित हुई या की विस्तृत ? आप स्वयं अनुभव कर लीजिए । महाभारत के उद्देश्य तथा उसके परिणाम को मैं तो देख रहा हूं । वह तब कि सारी त्रुटियां अब भी जस की तस है ।

किंतु हम सब कुछ महाभारत पर ही नहीं छोड़ सकते। हमारे पूर्वज तो हमारे लिए उदाहरण छोड़ गए पर क्या हम उससे कुछ सीख ले पाए हैं ? मुझे तो नहीं लगता कि हम कुछ सीख भी पाए हैं । इसके पीछे कुछ गलतियां हमारी भी है जिस पर हम ध्यान नहीं देते।
यदि सीधीे सी बात करें तो बात इतनी सी है कि हम इतिहास से सीखने वाले लोग हैं ही नहीं । महाभारत का उद्देश्य पूरा नहीं हो सका क्योंकि भारत के वंशजों ने महाभारत के उद्देश्य को ही भुला दिया ।

इस विषय पर आगे और चर्चा प्रस्तुत करूंगा। महाभारत के उद्देश्य बनाम भारत के लोग पर और मंथन करने की आवश्यकता है । आगे जल्द ही इस पर और लेख प्रस्तुत किया जाएगा।

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