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असमानता भारतीय लोकतंत्र को दीमक की तरह चाट रहा है

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असमानता भारतीय लोकतंत्र को दीमक की तरह चाट रहा है

असमानता भारतीय लोकतंत्र को दीमक की तरह चाट रहा है

असमानता भारतीय लोकतंत्र को दीमक की तरह चाट रहा है । वर्तमान में यह खाई इतनी बढ़ गई है कि राज्य के प्रत्येक स्तर पर भेद उत्पन्न हो गया है । आप भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे की किसी भी स्तर पर नजर दौड़ाईए आपको स्वत: ही आभास हो जाएगा । कोई भी ऐसा स्तर बाकी नहीं है जो समानता से मुक्त है । मूल रूप से इसी कारण देश में भ्रष्टाचार और अपराध इतना अधिक मजबूत है ।

असमानता भारतीय लोकतंत्र को दीमक की तरह चाट रहा है

कभी-कभी तो विचार आता है कि क्या असमानता के ही कारण तो नहीं यह देश अंदरूनी समस्याओं में परेशान है ? क्योंकि समानता ने समुचित ढांचे को ही उत्तल पुथल कर दिया है । वर्तमान में भारत में देखा जाए तो  असमानता सभी रूपों में मौजूद है । सामूहिक, संगठनात्मक, जातीय, लैंगिक , धार्मिक , आर्थिक, समाजिक, राजनीतिक, क्षेत्रीय, भाषाई, भौगोलिक  समानता मुख्य है ।

किंतु इसमें सबसे घातक आर्थिक असमानता ,  राजनीतिक असमानता और सामाजिक असमानता है। यह तीनों प्रकार के असमानता देश पर पूर्ण रूपेण हावी है । यह तीनों मिलकर देश पर एकाधिकार रूप से वर्चस्व बनाए हुए हैं । इन तीनो ने मिलकर सदा ही देश को हमेशा नीचे के तरफ ही ले जाने का कार्य किया है।

असमानता भारतीय लोकतंत्र को दीमक की तरह चाट रहा है

जहां सामाजिक असमानता में निरंतर लोगों के बीच खाई उत्पन्न किया है । वहीं आर्थिक असमानता ने तो हमेशा किसी ना किसी भी रूप में शोषण ही किया है। आज देश में आर्थिक असमानता इस कदर हावी है कि देश की आधी धनसंपदा कुछ चंद लोगों के तिजोरी में बंद पड़ी है । वहीं दूसरी ओर मिडिल क्लास लोग खाने कमाने में ही व्यस्त है तो गरीब भूखों मर रहा है । यह सोचने का विषय है कि आर्थिक असमानता किस तरह खाई उत्पन्न कर रही है । सरकार को जरूर कोई कदम उठाना चाहिए ।

खैर वास्तविकता देखा जाए तो इन तीनों में राजनीतिक असमानता सबसे घातक है। वैसे राजनेता तो सभी प्रकार के असमानओं को घातक बताते हैं किंतु राजनीतिक असमानता पर कुछ नहीं बोलते। वैसे राजनेता अपने भाषणों में तो सामाजिक और आर्थिक असमानता को अधिक घातक बता रहे हैं परंतु इस असमानताओं को फूलने फलने में योगदान भी देते रहे हैं । इसका मतलब साफ है कि राजनैतिक असमानता सबसे घातक है । क्योंकि यह सभी तरह के असमानताओं को आगे बढ़ाने में सहयोग देते हैं।

अक्सर राजनीति से संबंध रखने वाले लोग ही सभी तरह के असमानता को खाद पानी देते रहते हैं और घातक भी बताते हैं । इसलिए ऐसे लोगों पर संदेह होना लाजिमी है । कई मर्तबा तो बुद्धिजीवी भी राजनैतिक  असमानता का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थक होते हैं जिन्हें पकड़ पाना आसान नहीं होता। परंतु यह सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष राजनैतिक लोग संदेह के दायरे में आते हैं।

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युवा कहते हैं कि राजनीति गंदी चीज है परंतु राजनीति तो वह पवित्र चीज है जिसे सच्चे दिल से अपना कर किया जाए तो देश में राम राज आ जाए,युवाओं को इससे दूर भागने की जरूरत नहीं है 

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