अहंकारी व्यक्ति अपने साथ-साथ दूसरों का भी अहित करता है

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अहंकारी व्यक्ति अपने साथ-साथ दूसरों का भी अहित करता है

अहंकारी व्यक्ति

अहंकारी व्यक्ति अपने साथ-साथ दूसरों का भी अहित करता है

अहंकार अर्थात कुछ भी नहीं । अहंकारी व्यक्ति  स्वयं को बहुत कुछ तो समझता है परंतु वास्तव में वह कुछ भी नहीं होता । जो जितना ही बड़ा अहंकारी होता है वह उतना ही तुच्छ होता है । अहंकार नीचता का प्रतीक है छोटा होने का उदाहरण है । अहंकारी व्यक्ति अपने अहम के आवेश में स्वयं का तो नुकसान पहुंचाता ही पहुंचाता है किंतु साथ साथ वह अपने मद से दूसरों का भी अहित करता है ।

वैसे भी मनुष्य इस संसार में ना कुछ लेकर आया है और ना कुछ लेकर जाएगा । अपने उस शरीर को जिससे वह बेइंतहा प्यार करता है एक दिन उसे भी छोड़ कर चले जाना है । फिर किस बात का अहंकार किस श्रेष्ठता का घमंड करता है आदमी ? दरअसल जब मनुष्य स्वयं को औरों से श्रेष्ठ समझने लगता है तो अहंकार का जन्म होता है । अहंकारी होना एक तरह से मानसिक पागलपन की निशानी है । मानसिक पागलपन ही है जब कोई स्वयं को बढ़ा समझता है और दूसरे को छोटा । इसी भेद में वह दूसरों को कुचलने की सोचता रहता है ।

अहंकारी व्यक्ति अपना भी भला नहीं कर पाता

अहंकारी व्यक्ति किसी का सम्मान नहीं स्वीकार करता चाहे वह सम्मान का हकदार ही क्यों ना हो । उसकी चिंता तो बस अपने सम्मान की होती है । यही अहंकार धीरे-धीरे इतना बढ़ जाता है कि वह समस्त समाज से कट जाता है। लोग उससे प्रेम की जगह घृणा करने लगते हैं । अक्सर अहंकारी व्यक्ति जीवन के अंतिम पड़ाव पर इतना क्रूर हो जाता है कि मानवता ही भूल जाता है ।

दुनिया में जितने भी तानाशाह हुए हैं वह तानाशाह होने से पहले अहंकारी थे यही सत्य है । अहंकार के मध्य में जो भी व्यक्ति पागल होता है इतिहास में उसका नाम स्याह ही होता है । यदि मनुष्य छोटे स्तर का अहंकारी है तो भी मरने के बाद लोग सालों तक उसके करतूतों की व्याख्या करते रहते हैं वार्तालाप के माध्यम से ।

अहंकार भूलकर भी कभी नहीं करना चाहिए । ऐसा व्यक्ति भय दिखाकर सम्मान तो बटोर सकता है परंतु किसी के अंतर्मन से सम्मान नहीं पा सकता। ऐसे लोगों से कोई ह्रदय से प्रेम नहीं करता । इसके उल्टा जो भी आदमी अहंकारी नहीं है उससे लोग दिल से प्यार करते हैं और हृदय से सम्मान करते हैं । अहंकारी व्यक्ति फिल्मों के खलनायक की तरह होता है और अहंकार विहीन आदमी नायक की तरह होता है । यही फर्क होता है इन दोनों में । इसके साथ-साथ अहंकारी व्यक्ति से वह सब दूर हो जाते हैं जो वर्तमान में उसके पास होते हैं । धन सम्मान यश वैभव कुछ भी नहीं बचता उसके पास। सब कुछ उसके हाथों से रेत की तरह निकल जाता है।

  जहां मैं हूं वहां मैं ही नहीं हूं अर्थात जहां अहंकार है, मद है , घृणा है , राग है , द्वेष है , वहां सरस्वती जी लक्ष्मी जी नहीं रहती हैं । वैभव ज्ञान सब उससे कोसों दूर रहता है । वास्तव में प्राणी सब कुछ शरीर को ही समझ कर कहता है कि यह मेरा है । मद में आकर वैभव ज्ञान को दास समझ लेता है तथा अपने इस अहम के कारण ही आगे चलकर सब कुछ खो देता है जो भी उसके पास संचित होता है । उसके पास पाने के लिए कुछ भी नहीं रहता । तब दर-दर भटकता है ठोकरें खाता है तब वह दोष देता है सिर्फ भाग्य और कर्म को । लेकिन उसके वैभव की नैया तो उसके अहंकार के कारण डूबी होती है ।

वास्तविकता तो यही है कि अहंकार विहीन जीवन ही सच्चा जीवन है । अहंकार त्यागकर निस्वार्थ भाव से जीवन व्यतीत करना चाहिए । आकार विहीन जीवन में ही भलाई है । अहंकार से स्वयं को और दूसरों को दोनों का ही अहित होता है । जबकि अहंकार  विहीनता से हित होता है अपना भी और दूसरों का भी।

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