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भारत में धार्मिक व जातिगत समस्या का समाधान बेहद ही जरूरी है

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भारत में धार्मिक व जातिगत समस्या का समाधान बेहद ही जरूरी है

भारत में धार्मिक व जातिगत समस्या

भारत में धार्मिक व जातिगत समस्या का समाधान बेहद ही जरूरी है

अनेक जाति धर्म में बंटा हुआ भारत देश अनेक खूबियों के लिए विश्व में पहचाना जाता है । यहां शायद ही कोई दुनिया का धर्म होगा जिसकी उपस्थिति भारत में ना हो । परंतु जाति व्यवस्था की तो कहना ही क्या? भारत में इतनी जातियां है कि शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो सभी जातियों के नाम बता सके । ( भारत में धार्मिक व जातिगत समस्या ) यानी जाति पर अनुमान ही लगाया जा सकता है पर गिनती करना थोड़ा मुश्किल है । हालांकि सरकार इसकी आंकड़ा देती तो है पर क्या पता आंकड़ा निकालने के बाद एक नई जाति  उपज गई हो?  यहां तक कि जो धर्म विदेशों से होकर भारत तक आए हैं और जिन में जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं दी गई है वह भी भारत में जाति व्यवस्था पर ही संचालित होते देखे गए हैं । खैर यह तो रही जाति की बात , किंतु यह व्यवस्था तब बुराई का रूप ले लेती है जब लोग जाति के नाम पर एक दूसरे से घृणा करते लगते हैं और यह भूल जाते हैं कि जाति धर्म से पहले वह एक इंसान है ।

भारत में धार्मिक व जातिगत समस्या का समाधान

वास्तव में जाति और धर्म का वह काल तो मिल ही जाता है कि इसकी व्यवस्था कब की गई परंतु इंसान की उत्पत्ति कब की है इसका कोई प्रमाण सत्य पर आधारित नहीं मिलेगा । हालांकि जो लोग धर्म जाति का चश्मा लगाकर इस पोस्ट को पड़ेंगे वह तो बुरा मानेंगे क्योंकि यह वह चश्मा है जो इंसान के नजरिए को कुंठित तो करता है परंतु संकुचित भी कर देता है। ( भारत में धार्मिक व जातिगत समस्या )  आदमी जब धर्मांध हो जाता है या जाति के वायरस से ग्रसित हो जाता है तो वह अपने संगठन से बाहर नहीं देख पाता । वैसे ही जैसे सौ साल पहले के लोग धरती चांद सूरज से बाहर नहीं देख पाते थे ।

मेरा मानना है कि ईश्वर को पूजना मानना अच्छी बात है ईश्वर से प्रेम सबको होना चाहिए परंतु ईश्वर के नाम पर धरती को कचरा बनाने का किसी को अधिकार नहीं है । वास्तव में ईश्वर ने हम सभी इंसानों को धरती पर अशांति फैलाने के लिए तो नहीं बनाया । शायद उसने भी जब धरती पर मानव बसाया होगा तो उसकी भी कल्पना रही होगी कि इंसान धरती पर शांति कायम करके इसे स्वर्ग बनाएगा । सोचिए जब पिता अपने खून पसीने की कमाई लगाकर एक घर बनाता है तो क्या सोचता है ? वह भी सोचता है कि इस घर में हमारे बच्चे सुख चैन से रह सकेंगे तो फिर इस दुनिया को बनाते वक्त ईश्वर की क्या सोच रही होगी आप स्वयं सोच सकते हैं ।

परंतु हम तो समझते ही नहीं है । शायद हम सभी धर्म जाति के कुएं में फंसे एक मेंढक हैं जो अपने से अलग की दुनिया को स्वीकार ही नहीं करते । ( भारत में धार्मिक व जातिगत समस्या ) परंतु ऐसा नहीं है कुएं से बाहर भी दुनिया है और बहुत बड़ी दुनिया है जिस में विचरण करने के लिए जीवन बहुत छोटी है। किंतु हम सब जाति धर्म के जंजीर में ऐसे जकड़े हुए हैं कि इससे मुक्ति पाना आसान नहीं है ।

भारत में धार्मिक व जातिगत समस्या

मेरा मानना है कि हम सब इंसान हैं। किस धर्म का पालन करना है किस जाति में रहना है यह मेरा अधिकार होना चाहिए । एक इंसान होने के नाते लेकिन यह हमारी सोच हम तक ही सीमित होनी चाहिए । हमारा अधिकार हमारा अधिकार है हमारा अधिकार दूसरों के अधिकारों को लूटने का साधन नहीं है । इसलिए कौन किस धर्म से है या जाति से है या उस पर छोड़ देना चाहिए । परंतु मूल रूप से देखा जाए तो सब एक इंसान है और एक इंसान होने के नाते सब का सम्मान भी होना चाहिए। आप धर्म या जाति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं कर सकते किसी का मखौल नहीं उड़ा सकते किसी को अछूत नहीं कह सकते या मान सकते ।

दरअसल मेरा कहना है कि भेदभाव बिल्कुल ही नहीं होना चाहिए। धर्म और जाति आधारित भेदभाव भी सभी समस्याओं का कारण है । सबको खुद को अच्छा बताने का हक है पर दूसरों से तुलना करके दूसरों को अपने से नीचा या बुरा बताने का किसी को हक नहीं है।

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