व्यवस्था परिवर्तन अति आवश्यक है देश को सुचारू रूप से आगे ले जाने के लिए

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व्यवस्था परिवर्तन अति आवश्यक है देश को सुचारू रूप से आगे ले जाने के लिए

व्यवस्था परिवर्तन

व्यवस्था परिवर्तन अति आवश्यक है देश को सुचारू रूप से आगे ले जाने के लिए

यदि बात करें व्यवस्था की तो कोई भी व्यवस्था 3  प्रकार के समीकरणों से चलती है । यही तीन चीजें मूल रूप से अव्यवस्था को व्यवस्थित बनाए रखते हैं। पहला राज दूसरा समाज तीसरा व्यक्ति। व्यक्ति का स्वशासन और समाज का अनुशासन और राज्य का अपना शासन होता है । किसी भी देश में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो सही गलत का निर्णय स्वयं कर पाते हैं। आप स्वयं को खंगाल कर यह जान सकते हैं कि आप या तो ईश्वर के भय से ठीक राह पर चलते हैं या फिर समाज के बंधनों से बहिष्कार किए जाने के भय से । परंतु यदि इन दोनों का भय आपके अंदर से समाप्त हो जाए तब दंड ही एक ऐसा विधान है जिसका भय आप को रोक सकता है । अतः स्पष्ट हो जाता है कि राज्य समाज और व्यक्ति इन तीनों के तालमेल से व्यवस्था का संचालन होता है।

  यहां पर यह समझ लेना चाहिए कि समाज के द्वारा किसी को भी या तो समझाया जा सकता है या बहिष्कार किया जा सकता है , परंतु दंडित करने का अधिकार समाज के पास नहीं होता है। दंड देने का कार्य राज्य का है ना कि समाज का या व्यक्ति का। हालांकि पंचायत व्यवस्था में पंचायतों में दंड देने के कार्य को अंजाम दिया जाता रहा है, पर यह बिल्कुल ही गैरकानूनी है । इससे व्यवस्था बिगड़ेगी ही बनने की उम्मीद करना तो गलत ही होगा । ऐसे पंचायतों को कभी भी कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए और उन्हें समझना चाहिए कि राज्य का काम जब भी गैरकानूनी तरीके से हाथ में लेंगे तो व्यवस्था में असंतुलन उत्पन्न हो जाएगा , जो देश और देश के लोगों सब के लिए घातक होगा।

वर्तमान समय में समाज टूट गया है । ईश्वर का भय भी संकुचित ही हो गया है और राज्य तो अपना कार्य ही छोड़ चुका है । लगभग लगभग वास्तव में देखा जाए तो समान्य स्थिति में समाज को भय मुक्त होना चाहिए और अपराधियों और भ्रष्टाचारियों को भयभीत होना चाहिए। किंतु आज भारत में समाज कई कारणों के वजह से भय ग्रसित हैं और अपराधी लगभग भयमुक्त होकर घूम रहे हैं ।

अब आते हैं दंड पर तो किसी भी प्रकार के अपराध के लिए दंड की मात्रा अपराध की परिस्थितियों पर निर्भर करता है ना कि सिद्धांतों पर। उद्देश्य यही होना चाहिए कि क्राइम करने वाले लोग भय ग्रस्त रहे । वैसे कोई भी दंड मानवीय नहीं होता है परंतु व्यवस्था को संचालित करने के लिए दंड आवश्यक है वरना मानवता में ही उथल-पुथल मच जाएगा । हर दंड की मात्रा और तरीका अपराध पर निर्भर करता है। विधान में दंड की मात्रा वह तरीका समाज पर पड़ने वाले प्रभाव और मानवता के बीच तालमेल स्थापित करके चलता है। परंतु फिलहाल की व्यवस्था और संतुलन की समीक्षा की जाए तो सबसे बड़ा कारण यह निकल कर आता है कि दंड और मानवता को एक साथ जोड़ दिया गया है । कुछ लोगों तो अपराधियों के सुधार के नाम पर अपना समग्र जीवन खपा दिया।

दंडव्यवस्था किसी न किसी रूप में मानवीय तो नहीं है परंतु इस व्यवस्था को खत्म कर देने पर अपराधी  अमानवीय कार्यों को राज्य में अंजाम देने लगेंगे जिससे दूसरों का मानवाधिकार प्रभावित होने लगेगा। इसलिए दंड व्यवस्था होनी ही चाहिए राज्य को संचालित करने के लिए। फिर भी मैं कहूंगा कि दंड के सिद्धांतों और मात्रा की समीक्षा की जा सकती है और की जानी चाहिए। वास्तव में अपराध में अंकुश लगाने के लिए और अपराधी को सुधारने के लिए दिया जाता है ना कि अपराधियों को समाप्त करने के लिए ।  दंड व्यवस्था की समीक्षा में यह शामिल हो कि किसी ना किसी प्रकार अपराध में अंकुश लगे और अपराधी में सुधार भी हो । वर्तमान में कहीं ना कहीं दंड व्यवस्था में खामी तो है जिसे निरंतर अपराध बढ़ता ही जा रहा है जिसे दूर किया जाना चाहिए । इसके लिए व्यवस्था परिवर्तन अति आवश्यक है।

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