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Hindi lekhako aur Sahityakaro ki samasya ke bare mein Chaliye Jante Hain

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Hindi lekhako aur Sahityakaro ki samasya ke bare mein Chaliye Jante Hain

Hindi lekhako aur Sahityakaro ki samasya

Hindi lekhako aur Sahityakaro ki samasya ke bare mein Chaliye Jante Hain

दरअसल लेखक देश की वह कम्युनिटी है जो सबको अपनी रचनाओं और विचारों के माध्यम से सही रास्ते पर चलने का गुर सिखाता है । लोग उसे पढ़ते हैं और अपने जीवन में आगे बढ़ते हैं । ( Hindi lekhako aur Sahityakaro ki samasya ) यानी एक अच्छे लेखक का मानव समाज में बड़ा ही महत्व है । परंतु यह भी पीछे का एक सत्य ही है कि लेखक समाज प्रसिद्धि और आदर सम्मान में भले ही अन्य कम्युनिटी से पीछे नहीं खड़ी हो परंतु आर्थिक स्थिति के लिहाज से देखा जाए तो लेखकों की सबसे खराब दशा है । एक लेखक के पास यश प्रतिष्ठा तो होता है परंतु जीवन में अर्थ की सदा ही कमी रहती है ।

शायद ही लेखकों में कोई ऐसा लेखक इतना आगे निकल पाता है जो लेखन कि कमाई से घर चला पाता हो । उसको एक अलग से जॉब करना ही पड़ता है । अब हो गई ना हद आप एक वकील हो पर वकालत में आपको काम ना मिले और मजबूरन आपको किसी और क्षेत्र में काम करना पड़ जाए तो क्या आप कर पाओगे ? कुछ कुछ यही हालात लेखकों के साथ हो रहा है। ( Hindi lekhako aur Sahityakaro ki samasya ) वह पारंगत तो होता है लेखन के कार्य में परंतु चुकी इस कार्य में उसका रोजगार नहीं चल पाता इसलिए उसे विवश होकर अन्य क्षेत्रों में काम करना पड़ता है । हमारे देश में लगभग लगभग सभी लेखकों के पास एक सी समस्या है क्या करें ? ज्ञानी होकर भी बेचारे हैं किस्मत के सताए ।

Hindi lekhako aur Sahityakaro ki samasya

ऊपर से जब लेखक किसी तरह संघर्ष करके कुछ पैसा कमाता भी है तथा साथ-साथ लेखनी कार्य को जारी भी रखता है तो सबसे बड़ी समस्या आती है किताब छपवाने की । जब भी वह किसी पब्लिशर से मिलता है तो उसे किताब छपवाने के एवज में मोटी रकम देने पड़ते हैं । यानी परेशानियां कभी दूर नहीं होती । परेशानियां हर वक्त लगी रहती हैं । कई लेखक तो लेखन कार्य करते-करते इतना तंग आ जाते हैं कि छोड़ ही देते हैं अपने इस अजीज कार्य को । मतलब लेखन का भी कार्य सिर्फ एक कलम और एक कॉपी तक सीमित नहीं रह गया है । अब इस कार्य को करने के लिए भी मोटा धन खर्चा करना पड़ रहा है । लेखक को तब जाकर कोई एक जाना पहचाना यानी कि एक चर्चित लेखक बन पा रहा है कोई आदमी ।

Hindi lekhako aur Sahityakaro ki samasya

अर्थात दिमाग भी खर्च करो , कलम भी रगड़ो कापी पर बाद में पूजी भी खर्चा करो किताब प्रकाशित करने के लिए यदि किताबें छप भी जाए ले देकर फिर उसको बेचने की सबसे बड़ी समस्या आती है । ( Hindi lekhako aur Sahityakaro ki samasya ) यानी लेखक का ठीक वही हाल है कुएं से निकलो तो खाई में गिरो। 125 करोड़ की जनता में 500 किताबों की प्रतियों को बेचना इतना मुश्किल हो जाता है जितना आजकल चांद पर जाना मुश्किल नहीं रह गया है । और तो और देश के बुद्धिमान लोगों की तो बात ही छोड़िए। 3 घंटे में 400 से 500 खर्च कर देंगे सिनेमा देखने में परंतु एक ₹100 की किताब नहीं खरीदेंगे। हाला की किताब पढ़ने के बाद भी आपके घर की अलमारी में पड़ी रहेगी। जिसे आप के अलावा भी बहुत से लोग पढ़ सकते हैं । किंतु सिनेमा आप सिर्फ एक बार ही देख पाएंगे खर्च किए गए मूल्य में । यहां पर मैं यह नहीं कह रहा कि आप सिनेमा मत देखिए। सिनेमा देखना आपका अधिकार है देखिए और खूब देखिए।  किंतु किताबों के तरफ भी आइए , किताबे आपको ज्ञान देती हैं , किताब पर एक बार खर्च करने से आप उसे हजार बार पढ़ सकते हैं । यानी किताब अनमोल होती है । सभी को पढ़ना चाहिए ।

आपके द्वारा खरीदा गया यह किताब लेखक को और किताबें लिखने को प्रेरित करेंगे । जिससे साहित्य में क्रांति आएगी समाज मजबूत होगा देश मजबूत होगा। क्योंकि किताबे लिखी एक बार जाती हैं परंतु मार्गदर्शन सदियों तक करती हैं। आइए किताबों के तरफ और महत्त्व हीन हो चुकी शिक्षा व्यवस्था को महत्वपूर्ण बनाइए। एक शिक्षित समाज ही देश में परिवर्तन ला सकता है।

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