चंद्रमा को श्राप किसने दिया था और उनको मुक्ति कैसे मिली थी आइए जानते हैं

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चंद्रमा को श्राप किसने दिया था और उनको मुक्ति कैसे मिली थी आइए जानते हैं
 
 
 
 
 
चंद्रमा को श्राप किसने दिया था
 
 
 
 
 
 
 

चंद्रमा को श्राप किसने दिया था और उनको मुक्ति कैसे मिली थी आइए जानते हैं :- अग्नि पुराण की कथा में बताया गया है कि भगवान ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना करने का विचार किया तो सबसे पहले उन्होंने मानस पुत्रों की रचना की । इन्हीं मानस पुत्रों में से एक थे ऋषि अत्री । ऋषि अत्री का विवाह महर्षि कर्दम की कन्या अनुसूइया से हुआ था। बाद में देवी अनसूइया के 3 पुत्र हुए जो दुर्वासा दत्तात्रेय एवं सोम नाम से जाने गए। ऐसा माना जाता है कि सोम चंद्रदेव का ही एक नाम है।

 एक और कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति की 27 कन्याएं थी उन सभी कन्याओं का विवाह चंद्र देव के साथ हुआ था । किंतु चंद्रमा का समस्त अनुराग व प्रेम उनमें से केवल 1 रोहिणी के प्रति ही अधिक रहता था। चंद्रमा के इस कृत्य के कारण दक्ष प्रजापति की अन्य कन्याएं बहुत प्रसन्न रहती थी। उन्होंने अपनी यह व्यथा को अपने पिता को सुनाया। दक्ष प्रजापति ने इसके लिए चंद्र देव को अनेक प्रकार से समझाया ।
परंतु रोहिणी के प्रेम में उनके हृदय पर इसका कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा। अंततः दक्ष ने क्रुद्ध होकर उन्हें छय रोग से ग्रस्त हो जाने का श्राप दे दीया । इसी शाप के वजह से चंद्र देव तत्काल छय ग्रस्त हो गए । उनके छय ग्रस्त होते ही पृथ्वी पर सुधा शीतलता व वर्षण का उनका सारा कार्य रुक गया और चारों तरफ त्राहि-त्राहि मच गई। चंद्रमा भी बहुत दुखी और चिंतित थे। उन्होंने देवराज इंद्र से अपनी व्यथा सुनाई ।
चंद्रमा को श्राप किसने दिया था 
 उनकी प्रार्थना सुनकर इंद्रदेव  वशिष्ठ आदि ऋषि गण उनके उद्धार के लिए ब्रह्मा जी के पास गए । तत्पश्चात सारी बातों को सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा चंद्रमा अपने शाप के विमोचन के लिए अन्य देवों के साथ पवित्र प्रभास क्षेत्र में जाकर महामृत्युंजय भगवान शिव की आराधना करें । उनकी कृपा से अवश्य रोग मुक्त हो जाएंगे ।
बाद में चंद्र देव ने मृत्युंजय भगवान शिव की आराधना की । उन्होंने घोर तपस्या करते हुए 10 करोड़ बार मृत्युंजय मंत्र का जप किया । यह मंत्र से प्रसन्न होकर मृत्युंजय भगवान शिव ने उन्हें अमृत वर प्रदान किया। उन्होंने कहा चंद्रदेव तुम शोक ना करो। मेरे वर से तुम्हारा शाप मोचन होगा ही साथ ही साथ प्रजापति दक्ष के वचनों की रक्षा भी हो जाएगी । यह कहते हुए भगवान शिव ने प्रसन्न होकर चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया। तब से एक नाम भगवान का नाम सोमेश्वर नाथ हुआ।